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चौपालः एक खास तस्वीर

न्यूजीलैंड में लॉकडाउन की समाप्ति के बाद ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ को सख्त नियमों के साथ पालन किए जाने की वजह से उन्हें रेस्तरां में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई। दरअसल, उन्होंने पहले से अपनी टेबल की बुकिंग नहीं की थी।

Author Published on: May 22, 2020 2:24 AM
न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जसिंडा अर्डर्न अपने पार्टनर क्लार्क ग्रेफोर्ड के साथ मशहूर कैफे ऑलिव में पहुंची। लेकिन एंट्री नहीं मिली।

शायद ही कभी ऐसा हुआ होगा कि कोई रेस्तरां देश के प्रधानमंत्री को ही बाहर इंतजार करने को कह दे। यह वाकया न्यूजीलैंड में तब देखने को मिला, जब वहां के प्रधानमंत्री जसिंडा अर्डर्न अपने पार्टनर क्लार्क ग्रेफोर्ड के साथ मशहूर कैफे ऑलिव में पहुंची। न्यूजीलैंड में लॉकडाउन की समाप्ति के बाद ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ को सख्त नियमों के साथ पालन किए जाने की वजह से उन्हें रेस्तरां में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई। दरअसल, उन्होंने पहले से अपनी टेबल की बुकिंग नहीं की थी। रेस्तरां के बाहर तकरीबन पैंतालीस मिनट तक बाकी ग्राहकों की तरह इंतजार के बाद प्रधानमंत्री और उनके पार्टनर को अंदर जाने की इजाजत मिली।

इस तस्वीर के उलट हमारे यहां वीआईपी संस्कृति के चमकते चेहरे बनने के लिए एक अजब-सी होड़ मची हुई है। हमारे देश में बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी गाड़ियों पर सरपंच पति से लेकर सरपंच पुत्र तक और कांच पर ‘भारत सरकार’ और ‘राज्य सरकार’ यों ही रौब झाड़ने को नहीं लिख दिया जाता। यह ठसक दिखाने के साथ-साथ छोटे-मोटे नियम-कानून को तोड़ने के लिए बेधड़क रूप से प्रयोग होता है। पूर्णबंदी के दौरान ऐसे ढेर सारे मामले सामने आए हैं। भारत में वीआईपी संस्कृति अंग्रेजों की देन है और इसे अभी तक चलाए रखना हम भारतीयों की भूल है। इस तस्वीर को बदलने के लिए सरकार को कड़े से कड़े कदम उठाने चाहिए, ताकि लोगों में सद्बुद्धि आए और हमारी बदलती तस्वीरों को देख कर लोग प्रेरणा ले सकें। नेताओं को खुद भी न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी और रेस्तरां चालक के साहस से प्रेरणा लेनी चाहिए।
-मयंक सिंह राजपूत, पूर्वी चंपारण, बिहार

निजीकरण की मार
जिस तरह हर क्षेत्र में बड़ी तेजी से निजीकरण हो रहा है, उसे देख कर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भविष्य में कुछ ही क्षेत्र निजीकरण से अछूते रहेंगे। निजीकरण से क्या वास्तव में सरकार या देश की जनता को पहले से ज्यादा लाभ होगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। लेकिन अगर हम चिकित्सा क्षेत्र के निजीकरण को देखें तो जिन अस्पतालों और चिकित्सा संस्थाओं का निजीकरण हुआ था, क्या वे इस संकट के समय में हमारी मदद करने में सक्षम हैं? इसका सीधा उत्तर है- नहीं!
इस तरह से निजीकृत अस्पताल इस संकट के समय हमारी मदद के लिए और खासकर गरीब तबकों के लिए अक्षम सिद्ध हो रहे हैं, उसे देखते हुए हम यह कैसे मान लें कि आने वाले समय में कोयला क्षेत्र, विमानन क्षेत्र, जिनका निजीकरण बहुत तीव्र गति से हो रहा है, वे हमारे लिए लाभदायक होंगे! यह भविष्य में एक चुनौती के रूप में सामने आएगा। निजीकरण एक सीमा तक ही हमें लाभ पहुंचाता है, लेकिन जब यह ज्यादा हो जाता है तो खतरनाक सिद्ध होता है। खासतौर पर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हमारे देश में गरीब तबके निजीकरण की वजह से या तो अपने हकों से वंचित हो जाते हैं या फिर उसकी सुविधाओं के दायरे से बाहर हो जाते हैं।
-अभिषेक यादव, इविवि, प्रयागराज

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