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चौपालः दावे और हकीकत

भारत की अर्थव्यवस्था ने फ्रांस की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ कर विश्व में नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। लेकिन सवाल है कि क्या यह सिर्फ आंकडों का खेल है या इसमें कुछ सच्चाई भी है?

Author July 14, 2018 04:53 am
एक रुपए का सिक्का। (चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है।)

दावे और हकीकत

भारत की अर्थव्यवस्था ने फ्रांस की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ कर विश्व में नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। लेकिन सवाल है कि क्या यह सिर्फ आंकडों का खेल है या इसमें कुछ सच्चाई भी है? यदि सच्चाई है तो देश की आम जनता पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ना चाहिए। यह सही है कि ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं देश की अमीरी को दर्शाती हैं और मुल्क में अमीरों की संख्या भी दिनोंदिन बढ़ रही है लेकिन इस हकीकत को कैसे झुठलाया जाए कि लोगों को भोजन नहीं मिलता है, काम नहीं मिलता है, शिक्षा नहीं मिलती है, स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलती हैं, यहां तक कि प्रियजनों का शव ले जाने के लिए एंबुलेंस भी नसीब नहीं होती। यदि सचमुच भारत की उपर्युक्त उपलब्धि आंकड़ों का खेल नहीं है तो व्यावहारिक धरातल पर इसका सकारात्मक प्रभाव भी दिखना चाहिए।

हमारा देश सोने की चिड़िया था और आज भी अमीरों की संख्या कम नहीं हुई है लेकिन यहां विकास तो तब माना जाए जब गरीबों की संख्या में कमी आए और उनका जीवन स्तर ऊंचा उठे। बढ़ती विशाल जनसंख्या संसाधन में तब्दील कैसे हो, इस बात का समाधान यदि सरकार कर लेती है तो निस्संदेह हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को पछाड़ सकती है।

’मिथिलेश कुमार, भागलपुर

भलाई का काम

भारत में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं इसीलिए यहां धार्मिक स्थान भी काफी हैं। इन धर्मस्थलों में विदेशों से भी खूब श्रद्धालु आते हैं। दान-पुण्य करना हमारे यहां अच्छा बताया जाता है। इसी का अनुसरण करते हुए कुछ लोग धार्मिक स्थानों में दिल खोल कर दान देते हैं। भारत में जहां एक तरफ कुछ धार्मिक स्थानों में भारी भरकम धनराशि और सोने-चांदी काखजाना जमा है, वहीं दूसरी तरफ गरीब लोग महंगा इलाज न करा पाने के कारण दम तोड़े देते हैं। गरीब बच्चे अच्छी पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं और कुछ लोगों को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। अक्सर मीडिया में कुछ ऐसे धार्मिक स्थानों के बारे में बताया जाता है जिनके खजाने में करोड़ों की धनराशि व कई किलोग्राम सोना-चांदी पड़ा है। अगर इस भरे खजाने का प्रयोग स्कूल, अस्पताल या अन्य ऐसी जगह किया जाए जिससे देशहित तथा जनहित सधे तो शायद ईश्वर ज्यादा खुश होगा। वैसे पूजा के लिए तो दो फूल ही काफी होते हैं; अगर ईश्वर को खुश करना है तो अपनी नेक कमाई जरूरतमंद लोगों की भलाई के कामों में लगाओ।

’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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