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चौपालः नोटबंदी के बावजूद

केंद्र को कालेधन के खिलाफ और बड़े और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है क्योंकि 2000 का नया नोट चलन में आने से कालाधन और जमाखोरी बढ़ने की आशंका जताई जाती रही है।

नोटबंदी के बावजूद

केंद्र सरकार ने जाली मुद्रा और कालेधन पर लगाम कसने के लिए नवंबर 2016 में 1000 व 500 रुपए के नोटों का चलन बंद कर दिया था। अब रिजर्व बैंक ने आधिकारिक तौर पर बताया है कि नोटबंदी के वक्त500 और 1000 रुपए के करीब 15 लाख 44 हजार करोड़ रुपए मू्ल्य के नोट चलन में थे जिनमें से 15 लाख 31 हजार करोड़ रुपए मूल्य के नोट उसके पास वापस आ गए। इसका सीधा मतलब है कि नोटबंदी के बाद सिर्फ तेरह हजार करोड़ रुपए के पुराने नोट वापस नहीं आए। गौरतलब है कि सरकार नोटबंदी को सबसे बड़ा आर्थिक सुधार बताती रही है लेकिन रिजर्व बैंक के इन आंकड़ों से नहीं लगता कि वह आर्थिक रूप से सफल रही है। नोटबंदी के बाद आयकर राजस्व में करीब 25 फीसद की बढ़ोतरी, वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता और डिजिटल भुगतान करने वालों की संख्या में वृद्धि जैसी उपलब्धियों से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन इस सचाई को नकारना भी संभव नहीं है कि कालेधन की समांतर अर्थव्यवस्था अब भी जारी है। केंद्र को कालेधन के खिलाफ और बड़े और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है क्योंकि 2000 का नया नोट चलन में आने से कालाधन और जमाखोरी बढ़ने की आशंका जताई जाती रही है।

महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

बदले तस्वीर

रेल मंत्रालय द्वारा रेलवे सुरक्षा बल की आगामी भर्ती में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला स्वागतयोग्य है। रेलगाड़ियों में महिला पुलिसकर्मी की मौजूदगी से महिलाएं खुद को ज्यादा सुरक्षित तो महसूस करेंगी ही, इससे बड़े पैमाने पर लड़कियों के लिए रोजगार के भी अवसर पैदा होंगे। अक्सर देखा गया है कि हमारे समाज में लोग अपनी बेटियों को सुरक्षा से जुड़े कामों, जैसे पुलिस या फिर सेना में जाने से रोकते हैं। इससे लड़कियां खुद को कमजोर महसूस करती हैं। एक तरफ हमारा समाज लड़कियों के लिए बराबरी बात करता है तो दूसरी ओर उन्हें बहुत सारे काम करने से रोका जाता रहा है, जिन्हें वे करना चाहती हैं।

आज महिलाएं हवाई जहाज उड़ाने से लेकर सीमा की सुरक्षा का जिम्मा बखूबी निभा रही हैं। हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया की तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है मगर दुर्भाग्यवश आज भी देश के विकास में महिलाओं का योगदान बेहद कम है। सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियां रोजगार हासिल करें मगर उसके लिए उन्हें सुरक्षित माहौल भी मुहैया करना पड़ेगा ताकि वे निर्भीक होकर अपने काम कर सकें। आज भी हमारा समाज पुरुषप्रधान कहलाना पसंद करता है जिसे बदलने की सख्त आवश्यकता है। रूढ़िवादी सोच के कारण लड़कियां पिंजड़े में कैद पंछियोंं की तरह मनचाहा काम करने की हालत में नहीं दिखती हैं।

पीयूष कुमार, नई दिल्ली

हिंदी का दर्जा

सितंबर का महीना शुरू होते ही देश के तमाम सरकारी कार्यालयों, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिंदी के गुणगान के बैनर लगने शुरू हो जाते हैं क्योंकि इसी माह 15 सितंबर को हिंदी दिवस और इसके शुरुआती सप्ताह को हिंदी सप्ताह के रूप में मनाया जाता रहा है। इस दौरान विभिन्न मंत्रालय, कार्यालय हिंदी के प्रति सम्मान दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते हैं मगर यह सम्मान महज साप्ताहिक बन कर रह जाता है। हिंदी आज भी देश में अपने सम्मान की जंग लड़ती दिख रही है और उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया है।

शक्ति प्रताप सिंह, रश्मि खंड, लखनऊ

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