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चौपालः एक मिग और

एक और मिग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। सुखद पक्ष यह रहा कि पायलट सकुशल बच निकला। लेकिन इसके पूर्व की दुर्घटनाओं में विमान में सवार लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे।

एक मिग और

एक और मिग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। सुखद पक्ष यह रहा कि पायलट सकुशल बच निकला। लेकिन इसके पूर्व की दुर्घटनाओं में विमान में सवार लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे। उल्लेखनीय है कि भारत में पिछले तीन वर्षों में मिग श्रेणी के 25 से ज्यादा विमान एक के बाद एक दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। इनमें मिग-23 और मिग 27 शमिल हैं। मिग विमान की खरीदी मूलत: रूस से हुई है। वायु सेना के बेड़े को मजबूत करने के लिए वर्षों पहले खरीदे गए इन विमानों में से अधिकांश आज जर्जर हो चुके हैं। यह देश की सुरक्षा के लिए बहुत गंभीर चिंता का विषय है। मिग श्रेणी के खस्ताहाल हो चुके विमानों का इस्तेमाल प्रशिक्षण के लिए किया जाना जारी है। प्रशिक्षणार्थी और नवप्रशिक्षित विमान चालकों व प्रशिक्षकों के लिए ये विमान मौत का सामान ही सिद्ध हो रहे हैं। सरकार इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं है यही कारण है कि 2014 में उसने घोषणा की थी कि 2017 तक इन्हें पूरी तरह हटा दिया जाएगा। लेकिन 2017 कभी का गुजर गया, इस घोषणा को अमल में नहीं लाया जा सका है। परिणाम सामने है। सरकार को इस गंभीर विषय पर शीघ्रता से कार्रवाई करनी होगी। जर्जर विमानों को किसी भी प्रकार के कार्य में उपयोग किए जाने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगानी होगी ताकि देश के बहुमूल्य मानव संसाधन और संपत्ति को पहुंच रही क्षति रुक सके।

ऋषभ देव पांडेय, कोरबा, छत्तीसगढ़

कैसे बचे ताज

दुनिया के सात अजूबों में शुमार ताजमहल आज पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण खतरे में है। धुएं और प्रदूषित हवा के कारण ताज न केवल अपनी रंगत खो रहा है, बल्कि यमुना के प्रदूषित और घटते जलस्तर के कारण उसकी नींव भी खतरे में पड़ गई है। तमाम प्रयासों के बावजूद सरकार ताजमहल को पर्यावरणीय खतरों से बचाने में नाकाम रही है। इस मसले पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। इसके बावजूद सरकार ताज को लेकर स्पष्ट नीति बनाने में नाकाम रही है। अभी तक ताज के आसपास के प्रदूषण में कोई कमी नहीं आई है। इस तरह तमाम सरकारी प्रयास केवल कागजों तक सिमटे नजर आते हैं। ताज न केवल एक बहुमूल्य स्मारक है बल्कि यह हमारी सांझी सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धारोहर है, जिसे यूनेस्को ने भी विश्व विरासत घोषित किया है। लिहाजा, सरकार व नागरिकोंकी जिम्मेदारी है कि ताज को बचाने के ठोस उपाय करें।

गुलशन कुमार, अजमेर

समझ से बाहर

हिंदी को समर्पित सितंबर महीने में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन कुछ लोगों को ‘हैप्पी बर्थडे कृष्णा’ कहने की जरूरत क्यों आ पड़ी, यह समझ से बाहर की बात है और वह भी उन हिंदी भाषी प्रदेशों के लोगों के लिए जो हिंदी-विरोध के लिए दूसरे प्रांतों को दोष देते रहते हैं। ऐसा लगा जैसे वे किसी बाजू में रहने वाले अपने मित्र के बेटे कृष्ण को शुभकामनाएं दे रहे हैं! माना कि हिंदी में कुछ वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों की कमी है लेकिन हिंदी इतनी अक्षम भी नहीं है कि ‘हैप्पी बर्थडे कृष्णा’ कहना या लिखना पड़ जाए। ऐसे में हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा कैसे बन सकती है जब हम हिंदी प्रदेशों के लोग भी आपस में अभिवादन के लिए अंग्रेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं? किसी भी भाषा का प्रचार-प्रसार उसके प्रयोग और उपयोग पर निर्भर करता है; जुबानी जमा खर्च पर नहीं।

सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, दिल्ली

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