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चौपालः न्याय की छतरी

हाल ही में संपन्न हुए जेएनयू छात्र संघ के चुनावों में ‘सवर्ण छात्र मोर्चे’ की उम्मीदवार के तौर पर कुमारी निधि मिश्रा ने चुनाव लड़ा और इस गरीब और पिछड़े सवर्ण तबके तक सामाजिक न्याय के विस्तार की मांग की।

Author September 20, 2018 3:45 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

न्याय की छतरी

हफ्ता भर पहले की घटना है। दिल्ली में एक ही दिन, कुछ किलोमीटर और कुछ घंटे के अंतर पर दो घटनाएं घटीं। पहली, मोतीनगर में सीवर की सफाई के दौरान दम घुटने से चार मजदूर मारे गए। दूसरी घटना राजौरी गार्डन क्षेत्र की है जहां ‘हिट एंड रन’ का मामला सामने आया। इसमें भी दो लोग मारे गए। इन दोनों घटनाओं में मारे गए लोगों में दो ऐसे भी थे जिनके नामों पर गौर करना जरूरी है। सीवर में उमेश कुमार तिवारी की मौत हुई और ‘हिट एंड रन’ मामले में कृष्ण कुमार दूबे की। मतलब दो कथित सवर्ण मरे, एक गटर में और दूसरा पटरी पर सोते हुए। इससे चौंकने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसी घटनाएं पहले भी घटती रही हैं। चौंकने की जरूरत इस बात पर है कि ऐसे उदाहरण के बाद भी हमारे देश के सामाजिक विमर्शकार आज भी अगड़ेपन और पिछड़ेपन की लड़ाई को जातिगत खांचों में भर कर ही देखते हैं। क्या ऐसी सोच एक गुलाम मानसिकता नहीं है जिसमें किसी खास जाति के लोगों को यों ही विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का समझ लिया जाता है?

मृतक उमेश कुमार तिवारी के परिवार में उनकी आठ महीने की बेटी है। 2036 में जब वह अठारह साल की होगी तब भारत देश उसे किस सकारात्मक कार्रवाई का लाभ देगा! आज की बच्ची जब कल युवती होगी तो अपनी कौन-सी अस्मिता को लेकर चलेगी? ब्राह्मण की बेटी वाली या सीवर में डूब-घुट कर मर चुके एक दिहाड़ी मजदूर की अनाथ बेटी वाली? सवाल बहुत बड़ा है लेकिन जवाब कोई देना नहीं चाहता। विवादों से बचने के लिए कोई बोलता नहीं और सामाजिक संरचना में जातीयता की केंद्रीय भूमिका होने की रटी-रटाई बात पर अपनी मुहर लगा देता है। सवाल यह है कि इस देश का जो गरीब सवर्ण है वह कहां जाए? उसकी जाति में उसे गरीब कह कर दुत्कारा जाता है और पिछड़ी जातियां उसे सवर्ण कह कर दूरी बनाती हैं। इस तरह से वह कहीं का नहीं रह जाता है।

आखिर विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान में उसकी जगह क्या है? दलित उत्पीड़न पर, अल्पसंख्यक अत्याचार पर लोग कहते हैं कि यह देश उनका नहीं है। लेकिन गरीब सवर्ण! वह आज भी नहीं कहता कि यह देश उसका नहीं है। इससे पहले कि यह तबका भारत माता को अपनी सौतेली मां कहने लगे भारत सरकार को अपनी सामाजिक न्याय की छतरी में इन्हें भी ले आना पड़ेगा। चुनावी राजनीति के माध्यम से इस मांग को रखने की शुरुआत हो चुकी है। हाल ही में संपन्न हुए जेएनयू छात्र संघ के चुनावों में ‘सवर्ण छात्र मोर्चे’ की उम्मीदवार के तौर पर कुमारी निधि मिश्रा ने चुनाव लड़ा और इस गरीब और पिछड़े सवर्ण तबके तक सामाजिक न्याय के विस्तार की मांग की।

अंकित दूबे, जनेवि, नई दिल्ली

नेपाल के साथ

पिछले तीन-चार सालों के दौरान भारत और नेपाल के मधुर संबंधों में खटास आई है। नेपाल की शिकायत है कि भारत बड़े भाई की तरह व्यवहार करता है। जाहिर-सी बात है इस सबके बीच चीन भी अपनी चाल चल कर मौके का पूरा फायदा उठाते हुए नेपाल की हरसंभव मदद कर रहा है। यह आर्थिक मदद के अलावा कई तरह की सुविधाओं मसलन, इंटरनेट और बंदरगाहों के इस्तेमाल की अनुमति आदि के रूप में है। लेकिन समय रहते नेपाल को चीन की चालाकी को समझना होगा अन्यथा इसका खमियाजा उसे खुद भुगतना पड़ेगा। दूसरी तरफ भारत भी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सौहार्द से आगे बढ़ कर नेपाल की जरूरतों को समझते हुए उससे अपना संबंध ठीक रखे वरना आने वाले समय में ऐसी स्थिति दोनों ही देशों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। भौगोलिक समीपता कभी नहीं बदलने वाली इस बात का खयाल नेपाल और भारत दोनों को रखना होगा।

सत्यम प्रियदर्शी, दिल्ली विश्वविद्यालय

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