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चौपालः आपदा को न्योता

प्रकृति का कोप कितना भयावह होता है यह कुछ दिन पहले केरल में देखने को मिला जहां 488 लोगों को बाढ़ की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ी है।

प्रकृति का कोप कितना भयावह होता है यह कुछ दिन पहले केरल में देखने को मिला जहां 488 लोगों को बाढ़ की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ी है। मगर देश के अंदर सिर्फ एक केरल ऐसा राज्य नहीं है जिसने इस साल प्राकृतिक आपदा झेली है। उसके साथ नौ अन्य राज्यों में भी बाढ़, भूस्खलन और बारिश की वजह से 712 लोगों की जिंदगियां समाप्त हो चुकी हैं। ‘एनआरसी’ यानी राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया केंद्र द्वारा पेश किए गए आंकड़े के अनुसार इस वर्ष मानसून के मौसम में 1400 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सौ से ज्यादा लोगों की जिंदगी प्राकृतिक आपदा ने छीन ली है।

इक्कीसवीं सदी में हमारे देश में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौत प्राकृतिक आपदा के कारण हो जाती है तो इसका ठीकरा आखिर किसके सर फोड़ना चाहिए? सरकार की व्यवस्था या प्रकृति पर? जाहिर-सी बात है कि जब प्रकृति के साथ छेड़छाड़ होती है तभी वह अपना रौद्र रूप दिखाने पर मजबूर होती देती है। दरअसल, हमारे देश में लोग लालच के कारण इतने अंधे हो चुके हैं कि जिस जगह पर प्राकृतिक सुंदरता बची हुई है वहां बहुमंजिला इमारतों और होटलों का निर्माण कर उसे घनी आबादी वाला क्षेत्र बना देते हैं। नतीजतन, समूचा वातावरण तो प्रभावित होता ही है, करोड़ों का नुकसान भी होता है।

चाहे इस साल केरल की बाढ़ हो, 2013 में उत्तराखंड, 2014 में जम्मू कश्मीर या चेन्नई में 2015 की बाढ़ हो, सभी राज्यों में बाढ़-त्रासदी के पीछे बाढ़ प्रबंधन नीति की बहुत बड़ी विफलता साफ नजर आती है जिसे दुरुस्त करने की बेहद जरूरत है। 2010 में चिंता जताई गई थी कि भारतीय उपमहाद्वीप में वर्षा के बादलों को तोड़ने वाला पश्चिमी घाट प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण सिकुड़ता जा रहा है। मगर केंद्र द्वारा गठित गाडगिल पैनल की रिपोर्ट को राज्य सरकारों ने ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत नहीं समझी थी जिसके कारण ‘गॉड्स ओन कंट्री’ कहे जाने वाले केरल में 488 लोगों की जान चली गई और न जाने कितनों की जिंदगी बर्बाद हो गई है।

जलवायु परिवर्तन के कारण जिस प्रकार हमारे देश का मौसम बदलता जा रहा है उससे बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार प्राकृतिक आपदाएं रोकने के लिए ज्यादा गंभीरता से सोचे और भविष्य में प्रकृति की किसी भी प्रकार की चेतावनी को हल्के में लेने की भूल न करे।

पीयूष कुमार, नई दिल्ली

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