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चौपालः हमारा पानी

आज जल संकट का समय है। पानी प्रकृति की अनमोल सौगात है लेकिन उसके वर्तमान में हो रहे बेपरवाह प्रयोग से लगता है कि मनुष्य को भविष्य में बूंद-बूंद के लिए तरसना होगा।

Author July 23, 2018 3:56 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)

आज जल संकट का समय है। पानी प्रकृति की अनमोल सौगात है लेकिन उसके वर्तमान में हो रहे बेपरवाह प्रयोग से लगता है कि मनुष्य को भविष्य में बूंद-बूंद के लिए तरसना होगा। कई देश पानी का महत्त्व जान चुके हैं और इसके संरक्षण की दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं। लगता है कि अगला विश्वयुद्ब पानी के स्रोतों पर काबिज होने के लिए ही होगा। बेशक हमारे देश के कई राज्यों में पानी की इमरजेंसी जैसे हालात पैदा हो जाते हैं, पर अभी भी लोग जल संकट के कारणों के निवारण के लिए गंभीर नहीं हैं। राजस्थान जैसे राज्य में पानी के लिए लगती लंबी-लंबी कतारें भविष्य के भयानक मंजर को बयां करती हैं। जल संकट के कारण बेशकीमती जमीन बंजर हो रही है। पानी से लबालब भरे कई दरिया, रेत के दरिया बन चुके हैं। पंजाब की धरती, जो पांच दरियाओं की धरती है, वहां भी हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। पहले पीने योग्य साफ मीठा पानी 50-60 फुट की गहराई पर नलकों से मिल जाता था, अब उसी पानी को 300-400 फुट गहराई से निकलने के लिए ‘सबमर्सिबल पंप’ जोर आजमाइश कर रहे हैं।

धरती ने यह पानी अपनी कोख में आने वाली पीढ़ी के लिए संभाल कर रखा था, जो हमारी नासमझी की भेंट चढ़ रहा है। प्रकृति की मर्जी के विरुद्ध प्रयोग इस जल में मिले यूरेनियम, सीसा, फ्लोराइड, क्रोमियम, आयरन जैसे जहरीले पदार्थ पंजाब के कई क्षेत्रों में कैंसर का कारण बन रहे हैं। पंजाब का बिगड़ा फसल चक्र भी इसका जिम्मेवार है। किसान ज्यादा मुनाफे के लालच में जीरी के खेती करके, जो कई गुना ज्यादा पानी मांगती है, भूजल का दुश्मन बन बैठा है। सरकार को चाहिए कि किसान को इस फसल का विकल्प उपलब्ध कराए और बहुमूल्य जल की संभाल का जिम्मा ले। पानी के महत्त्व के बारे में गुरबाणी में भी दर्ज है, ‘जल ही तै सब उपजे बिन जल प्यास ना जाये। जल ते त्रिभुवन साजिया घट घट ज्योति समोए।’

मनुष्य अपने इर्द-गिर्द जमीन को पक्का करता जा रहा है और प्रयुक्त पानी को धरती में रिस कर जाने का रास्ता नहीं मिल रहा। पानी बह कर, प्रदूषित होकर जल स्रोतों में जा मिलता है। प्रेशर से गाड़ियां धोना, ब्रश करते समय नल खुला रखना, गलियों और पार्कों में बेमतलब पानी बहाना, आरओ का प्रयोग, और तो और रोष प्रदर्शनों में अपनी मांगों के लिए तड़पते लोगों पर पानी की बौछार करना भी पानी के कत्ल के समान जुर्म है। अब समय आ गया है कि हम पानी की एक-एक बूंद बचाने का प्रण लें। जल संरक्षण के लिए ‘सोक पिट्स’ का निर्माण बड़े स्तर पर करें। बारिश के पानी को फिर से धरती में मिलाने के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को गंभीरता से अपनाएं। पानी बचाएं, इसका उचित प्रयोग करें और आने वाली पीढ़ी को पानी की समस्या के लिए पिछली पीढ़ी पर उंगली उठाने का मौका न दें।

कुलदीप शर्मा, जालंधर

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