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चौपालः हादसे का इंतजार

आज देश के तमाम शहरों में फ्लाईओवर बन गए हैं लेकिन हमें यातायात जाम से निजात नहीं मिल पाई है। देश एक तरफ आगे तो बढ़ रहा है मगर दूसरी तरफ एंबुलेंस या दमकल की गाड़ियों को निकलने की जगह नहीं मिल पाती है।

Author August 23, 2018 1:58 AM
यातायात के सार्वजनिक साधनों की उपलब्धता बढ़ाने और उनके उपयोग के लिए लोगों को प्रेरित किया जाना चाहिए।

हादसे का इंतजार

आज देश के तमाम शहरों में फ्लाईओवर बन गए हैं लेकिन हमें यातायात जाम से निजात नहीं मिल पाई है। देश एक तरफ आगे तो बढ़ रहा है मगर दूसरी तरफ एंबुलेंस या दमकल की गाड़ियों को निकलने की जगह नहीं मिल पाती है। मानसून के मौसम में तो यातायात जाम और सड़कों की हालत और ज्यादा खराब हो जाती है जिसकी वजह से मरीज कई बार सड़क पर ही दम तोड़ देता है। सरकार पहले से कहां सोई रहती है? क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जाता है? कहीं भी देखो, सड़कों के किनारे गाड़ियों की कतारें मिल जाती हैं। इससे वायु प्रदूषण जैसे कई अन्य खतरे पैदा होते हैं। इसके मद्देनजर हमें निजी वहनों को कम करने की जरूरत है। यातायात के सार्वजनिक साधनों की उपलब्धता बढ़ाने और उनके उपयोग के लिए लोगों को प्रेरित किया जाना चाहिए।

आशीष, दिल्ली

कानून से उम्मीद

देश में 12 साल से कम आयु की बच्चियों से बलात्कार के अपराध में मृत्युदंड तक की सजा देने के प्रावधान वाले विधेयक को संसद की मंजूरी मिलना स्वागतयोग्य है। इसके जरिए भारत दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1972, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 और लैंगिक अपराधों में संरक्षण अधिनियम 2012 के संशोधन का प्रावधान है। अब इंतजार इस बात का है कि कब यह कानून की शक्ल लेता है। भारत में छेड़छाड़ और बलात्कार के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगा पाना सरकार के सामने एक गंभीर चुनौती है जिससे हर हाल में उसे निपटना होगा। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में भारत में बलात्कार के 38,947 मामले दर्ज हुए। राजधानी दिल्ली में 2011-2016 के बीच महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में 277 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दिल्ली में 2011 में जहां बलात्कार के 572 मामले दर्ज किए गए थे वहीं 2016 में यह आंकड़ा 2155 रहा। दुष्कर्म के अपराध में दोषियों को मृत्युदंड जैसी कठोर सजा का प्रावधान बेटियों एवं महिलाओं को भयमुक्त एवं सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में एक सार्थक कदम साबित होगा।

कुंदन कुमार क्रांति, बीएचयू, वाराणसी

इनका इलाज

स्वास्थ्य संबंधी भ्रामक विज्ञापनों को रोकने के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम स्वागतयोग्य हैं। हर तरह की बीमारियों के इलाज का दावा करने वाले विज्ञापनों के लिए नियमों में बदलाव किए जा रहे हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में हमें ऐसे विज्ञापन कहीं भी दिखाई दे जाते हैं। बस स्टेशनों से लेकर चौराहों, स्कूलों और सार्वजनिक शौचालयों आदि की दीवारों, अखबारों और पत्रिकाओं सहित टेलीविजन पर शर्तिया इलाज के अनगिनत विज्ञापन रोज नजरों से गुजरते हैं। अहम बात यह है कि एड्स और कैंसर समेत अनगिनत रोगों का इलाज शर्तिया तौर पर करने का दावा इन विज्ञापनों में होता है जिससे कोई भी इन पर भरोसा कर ले। इन विज्ञापनों में बताए गए इलाज करने वाले अधिकतर लोग किसी भी पद्धति के चिकित्सक नहीं होते और न ही उन्होंने किसी तरह की विधिवत शिक्षा ली होती है। इनके विज्ञापनों में प्रदर्शित चमत्कारों के बाद लोग इनके चंगुल में फंस ही जाते हैं। इससे कई बार तो मरीजों की जान पर भी बन आती है। गंजे सिर पर बाल उगाने का विज्ञापन हो या मिर्गी के दौरों व अन्य असाध्य रोगों का स्थायी इलाज करने वाले इन विज्ञापनदाताओं पर सरकार अब शिकंजा कस रही है। इससे आम आदमी झोलाछाप डॉक्टरों से बचेगा।

संदीप भट्ट, खंडवा, मध्यप्रदेश

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