मदद की दरकार

देश के कई इलाकों में बाढ़ से हाहाकार मचा हुआ है।

सांकेतिक फोटो।

देश के कई इलाकों में बाढ़ से हाहाकार मचा हुआ है। लोगों की जिंदगी भाग दौड़ में बदल गई है और परिस्थितियां एक तरह से कहर बन गई हैं। सरकार पर से लोगों की उम्मीद टूटती हुई नजर आ रही है समाज और विश्वास दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है, क्योंकि ऐसे हालात में उन्हें सहारे की जरूरत है, लेकिन वे लाचार सिर्फ मदद की राह देख रहे हैं। ऐसे में सरकार को अपनी समूची व्यवस्था के साथ जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए खड़ा होना चाहिए।

उनके लिए बाढ़ राहत शिविर लगाना चाहिए। भोजन, दवा, चलंत शौचालय, बिजली की व्यवस्था करनी चाहिए। साथ ही प्रशासनिक महकमों को बाढ़ क्षेत्र में गश्ती, एंबुलेंस, चलंत अस्पताल, दवा की व्यवस्था सुनिश्चित करानी चाहिए। उस क्षेत्र के जनप्रतिनिधि को भी आकर आकर उनके लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाना और सरकार से संकट से जूझ रहे इलाकों को बाढ़ प्रभावित घोषित कराने के लिए दबाव बनाना चाहिए, ताकि जनता की क्षति की भरपाई हो सके।
’एस कुमार, लालगंज, वैशाली, बिहार

जीवन का महत्त्व

जीवन मायने रखता है, क्योंकि जीवन के बिना कुछ भी मायने नहीं रखता। इस आधुनिक युग में समाज कुछ कमियों के साथ तेजी से विकसित हो रहा है। ऐसी ही एक स्थिति है पशु क्रूरता का सामना करना। देशभर में पशु के खिलाफ क्रूरता एक आम समस्या है। हमारे संविधान में पशु सुरक्षा कानूनों का उल्लेख किया गया है, लेकिन ऐसा लगता है कि ये कानून समस्या का मुकाबला करने के लिए ज्यादा प्रभावी नहीं हैं। पशु संरक्षण अधिनियम, 1960 के अनुसार जानवरों के साथ क्रूर व्यवहार करने पर दस रुपये से लेकर दो सौ रुपए तक जुर्माना या तीन महीने की जेल का प्रावधान है।

अब यहां सवाल उठता है कि क्या यह प्रावधान पशु क्रूरता का मुकाबला करने में इतने सक्षम है? भारतीय संविधान में पशु संरक्षण के प्रावधान लागू होने वाले ठोस कानून के बजाय सिद्धांत बने हुए हैं। भारत के लिए एक मजबूत पशु संरक्षण कानून प्रदान करने के लिए इस संबंध में व्यापक सुधार किए जाने की आवश्यकता है। यह कहना उचित होगा कि भारत में पशु कानून के लिए एक ठोस आधार विकसित करने के लिए अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
’निखिल रस्तोगी, अंबाला कैंट, हरियाणा

आबादी की फिक्र

‘बढ़ती आबादी, घटते संसाधन’ (लेख, 30 अगस्त) में लेखक ने ज्वलंत समस्या की ओर ध्यानाकर्षित करने का प्रयास किया है। बढ़ती आबादी सिर्फ भारत की नहीं, पूरे विश्व की समस्या है। इतनी बड़ी कि अब दुनिया पृथ्वी से बाहर ऐसे किसी ग्रह की खोज में है, जहां पृथ्वी जैसे जीवन के अनुकूल वातावरण और संसाधन उपलब्ध हों। कयास मंगल ग्रह के लगाए जा रहे हैं। लेकिन यह कितना सफल होगा, अभी कह नहीं सकते। अत्यधिक आबादी से रोजगार, खाद्य पदार्थों, अनाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। अपराधों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अपने देश में इस समस्या की गंभीरता को लेकर सरकार तो प्रयास कर रही है, लेकिन जब तक इसमें जनता का पूरा सहयोग नहीं मिलेगा, इस पर राजनीति होती रहेगी और समस्या का समाधान संभव नहीं होगा।

लोकतंत्र जनता के लिए है, लेकिन अगर जनता ही लोकतंत्र के माध्यम से अपने निजी स्वार्थों को जनहित, जन कल्याण के ऊपर रखती है तो सरकार को ठोस निर्णय लेने होंगे। ऐसा ही निर्णय लेने के लिए सरकार पर सभ्य समाज द्वारा दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है। आए दिन जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग की जाने लगी हैं। कुछ राज्यों में तो इस पर काम भी शुरू हो चुका है। यह समस्या जनता द्वारा पैदा की गई है, इसका समाधान भी जनता को निकालना होगा।
’युवराज पल्लव, मेरठ, उप्र

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