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चौपालः वक्त की मांग

दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए हमारे प्रधानमंत्री का अधिकतम जोर ‘चौथी औद्योगिक क्रांति’ पर था।

Author August 7, 2018 4:09 AM
एक तरफ हमारी सरकार शिक्षा को टेक्नोलॉजी से जोड़ने की बात कर रही है मगर दूसरी तरफ आज भी सरकारी स्कूलों की हालत भयावह बनी हुई है जहां न तो बच्चों को पढ़ाने के लिए अच्छे शिक्षक मौजूद हैं न ही बेहतर शिक्षा के लिए आवश्यक आधारभूत ढांचा।

दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए हमारे प्रधानमंत्री का अधिकतम जोर ‘चौथी औद्योगिक क्रांति’ पर था। आज वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में दुनिया के अधिकतर देश चौथी औद्योगिक क्रांति से निकली कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, रोबोट और डिजिटलीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। इसी कड़ी में अन्य विकासशील देशों की तरह हमारा देश भी डिजिटलीकरण की तरफ तीव्र गति से बढ़ता जा रहा है। मौजूदा सरकार की तरफ से चलने वाली ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसी योजनाओं का मकसद ही है कि ज्यादा से ज्यादा लोग डिजिटलीकरण से जुड़ जाएं। बेशक इक्कीसवीं सदी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सदी होगी जिसमें हमारे देश को भी औद्योगिक तकनीक और डिजिटल आधार को मजबूत कर पूंजी से ज्यादा कौशल को महत्त्व देना पड़ेगा। मगर हमारे देश के अंदर जहां आज भी लगभग तीस प्रतिशत आबादी अनपढ़ की श्रेणी में आती है और एक बड़ी आबादी दरिद्रता के घेरे में है, डिजिटलीकरण करना कतई आसान नहीं होगा।

एक तरफ हमारी सरकार शिक्षा को टेक्नोलॉजी से जोड़ने की बात कर रही है मगर दूसरी तरफ आज भी सरकारी स्कूलों की हालत भयावह बनी हुई है जहां न तो बच्चों को पढ़ाने के लिए अच्छे शिक्षक मौजूद हैं न ही बेहतर शिक्षा के लिए आवश्यक आधारभूत ढांचा। पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि जिस गति से ई-प्लेटफॉर्म मसलन ‘ई-मार्केटिंग’ और ‘नेट बैंकिंग’ जैसे माध्यमों में बढ़ोतरी हुई है उसी समय साइबर क्राइम और डाटा हैंकिग जैसे अपराधों में भी इजाफा हुआ है। एटीएम मशीनों पर देश के औसत पढ़े लिखे गरीब लोग धोखाधड़ी के शिकार बन कर अपनी महीनों की जमा पूंजी लुटा बैठते हैं। क्या हमारा देश डिजिटलीकरण के नकारात्मक प्रभाव को रोकने में सक्षम है? आज साइबर अपराध जैसी समस्याओं से लड़ने के लिए ‘साइबर थाने’ कुछ ही बड़े शहरों तक सीमित हैं।

अगर सरकार चाहती है कि भारत ‘डिजिटल देश’ बने तो सबसे पहले शिक्षा नीति में व्यापक बदलाव करने पड़ेंगे ताकि देश का भविष्य कहलाने वाले विद्यार्थी मूलभूत शिक्षा के साथ-साथ नई टेक्नोलॉजी से जुड़ सकें। देश के सामने चुनौतियां काफी हैं। इसका यह मतलब नहीं कि भविष्य को सशक्तन बनाएं। वक्त की मांग को देखते हुए देश के हर नागरिक को डिजिटलीकरण अपना कर खुद को बेहतर बनाना ही पड़ेगा। इसमें थोड़ी सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराए ताकि लोग अपने बेहतर भविष्य के सपने देख सकें।

पीयूष कुमार, नई दिल्ली

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