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नदियों की मुक्ति

जब सत्ता के तार पूंजी से जुड़ जाते हैं और संयोग से इसे धार्मिकता की भी आड़ मिल जाती है, फिर चाहे जंगल हो, जल या जमीन, सरकार द्वारा खड़ा किया गया विकास का दानव इनमें से किसी को भी नहीं बख्शता।

Author नई दिल्ली | Updated: May 24, 2016 3:25 AM
jansatta, duniya mere aage, column, nature, culture, kahma sharma articleचित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

मेधा पाटकर ने ‘आचारों से खाली विचारों का महाकुंभ’ (19 मई) लेख में विकास के नाम पर नदियों के विनाश का कटु सत्य उजागर किया है। जब सत्ता के तार पूंजी से जुड़ जाते हैं और संयोग से इसे धार्मिकता की भी आड़ मिल जाती है, फिर चाहे जंगल हो, जल या जमीन, सरकार द्वारा खड़ा किया गया विकास का दानव इनमें से किसी को भी नहीं बख्शता। क्षिप्रा नदी का मृतप्राय होना कोई ऐसी क्षति नहीं जिसे मामूली कह कर नजरअंदाज कर दिया जाए। नर्मदा का कहां तक दोहन करते रहेंगे? कहीं यह पढ़ा-सुना है कि अमदाबाद की साबरमती भी नर्मदा के जल से जिंदा की गई है। नदी के जलग्रहण क्षेत्र और उसके पर्यावरण अनुकूलन पर ध्यान देने की भी जरूरत नहीं समझी गई और देखते ही देखते वहां एक तरफ सैर-सपाटे के लिए कंक्रीट के चौड़े रास्ते बन गए।

सरकारों की संवेदनहीनता के पीछे तो खैर उनके अपने स्वार्थ या ‘विकास’ के तर्क मौजूद रहते हैं। पर देखने में आता है कि अपनी नदियों-नहरों को स्वच्छ रखने में जनसामान्य की भागीदारी भी न के बराबर है। इधर लोगों को बोरों में भरी पूजा की सामग्री भाखड़ा नहर में गिराते हुए आम देखा जाता है। भाखड़ा तो क्या चीज है, लोग उन नदियों को स्वच्छ रखना भी जरूरी नहीं समझते जिन्हें वे मां कह कर बुलाते हैं।

आस्था किसी तर्क को नहीं मानती, पर आस्था के अपने तर्क होते हैं, जिन पर कोई लगाम उसे बर्दाश्त नहीं। अभी कुछ दिन पहले वाट्सऐप पर एक संदेश था: ‘‘उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में सरकार ने नदी को गंदा ना होने देने के लिए बहुत ही अनूठा तरीका निकाला है। इस तरीके से विसर्जित होने वाले फूल और प्लास्टिक की पन्नियां नदी को गंदा नहीं कर पाएंगे। घाट से थोड़ी दूर ही एक जाल लगाया गया है जो विसर्जित सामग्री को रोक लेता है। शाम को जाली हटा के सामग्री हटा ली जाती है। ऐसी सोच के लिए कुंभ के लोगों को नमन’’।

प्रशासन द्वारा ऐसे उपाय अन्य पवित्र नदियों के लिए भी किए जाते होंगे। इसका मतलब यह कि भक्त-जन तो पूजा-सामग्री का विसर्जन नदियों में करेंगे ही, क्योंकि ऐसा करना उनकी आस्था से जुड़ा है। आगे उसका क्या होगा यह सोचना उनका काम नहीं। पूजा-पाठ या जल-विसर्जन के लिए वे वृक्षों से सुंदर रंगबिरंगे पुष्पों को भी तोड़ेंगे, जिनके टहनियों पर सजे होने और हवा में झूलने से ईश्वर की मौजूदगी का अहसास होता है। अगर उन्हें नदियों में विसर्जन का कोई विकल्प भी सुझाया जाए तो भी उन्हें स्वीकार नहीं होगा। हां, श्रद्धालुओं को अगर वही लोग यानी पुरोहित-पुजारी ही कोई नया विकल्प अपनाने की बात कहें तो वे जरूर सोचेंगे। बेहतर तो यही है कि हम इस ओर अपनी प्रतिबद्धता महसूस करें। प्रशासन की जिम्मेदारियों को बढ़ाने की बजाय प्रशासन के साथ सहयोग का रवैया अपनाएं।

’शोभना विज, पटियाला

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दोषी हम
‘सूर्य देव का कहर! सूरज दिखा रहा है डिग्री। सूरज आग बरसा रहा है।’ इस तरह की बहुत सारी खबरें सुनने को मिल रही हैं। क्या इस बढ़ी हुई गर्मी का कारण सचमुच सूरज है? कहीं इसका कारण हम इंसान ही तो नहीं? बढ़ता प्रदूषण और ग्रीन हाउस गैसें क्या सूर्य देव की देन हैं? हम अब भी वही कर रहे हैं जो अक्सर करते आए हैं, अर्थात अपना दोष दूसरे पर मढ़ना। अगर हम नहीं संभले तो यह गर्मी साल दर साल ऐसे ही बढ़ती जाएगी। इस बढ़ती गर्मी से बचने के लिए हम क्या कर रहे हैं? प्रदूषण कम करने, हरियाली बढ़ाने, वन और जल संरक्षण के बजाय अधिक एसी, पेट्रोल, डीजल और बिजली का इस्तेमाल, जिससे ग्रीन हाउस गैसें और बढ़ रही हैं। हालांकि विश्व पटल पर इससे संबंधित बहुत सारे समझौते हुए हैं पर वे बिगड़ते हालात को देखते हुए पर्याप्त नहीं हैं। तापमान 50 के पार होना एक चेतावनी है। इससे निपटने के लिए संपूर्ण विश्व को ईमानदार प्रयास करने चाहिए।

’राहुल रावत, कोटपूतली, राजस्थान


न्याय की नजीर
कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने साफ तौर पर कहा था कि देश की अदालतों में लंबित मुकदमों के ढेर के लिए केवल न्यायाधीश जिम्मेदार नहीं हैं। इसकी असल वजह हमारे यहां जजों की संख्या काफी कम होना है। आज जजों के लगभग पांच हजार पद रिक्त पड़े हैं। 1985 के बाद देश की आबादी तीस करोड़ बढ़ी है लेकिन जज इक्कीस हजार ही हैं। न्यायमूर्ति ठाकुर की वेदना का यदि सबसे अधिक प्रभाव पड़ा तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय पर। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डॉ डीवाई चंद्रचूड़ ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया और गर्मी के छुट्टी में भी कार्य करने का निर्णय लिया।

इससे लंबित मुकदमों का निस्तारण तीव्र गति से हो सकेगा। मुख्य न्यायाधीश की पहल पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 68 न्यायाधीशों ने भी गर्मी की छुट्टियों में न्यायिक कार्य करने की सहमति दे दी है। अधिवक्ता भी कार्य करने पर सहमत हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय देश का ऐसा पहला उच्च न्यायालय है जिसने ऐसा कदम उठाया है। उसका यह कदम अन्य उच्च न्यायालयों के लिए अनुकरणीय नजीर है।

’संतोष कुमार, बाबा फरीद कॉलेज, बठिंडा


सिमटती कांग्रेस
पिछले दिनों हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों से एक संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया कि पांच में से चार राज्यों की जनता ने कांग्रेस को सिरे से नकार दिया। अब कांग्रेस की मौजूदगी मुल्क के सिर्फ 14 प्रतिशत हिस्से अर्थात केवल छह राज्यों में बची है जबकि 1951-52 में देश के 93 प्रतिशत हिस्से यानी जम्मू-कश्मीर को छोड़ पूरे मुल्क में सिर्फ कांग्रेसनीत सरकारें थीं। देश की आजादी के आंंदोलन का नेतृत्व करने वाली इस सबसे पुरानी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी की मौजूदा दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण शीर्ष कांग्रेसी नेतृत्व की चौतरफा विफलता है। राहुल गांधी के भीतर वह काबिलियत नहीं है और न वे राजनीति को गंभीरता से लेते हैं।

राहुल गांधी को पिछले साल ही स्थानीय कांग्रेसी नेताओं ने चेताया था कि असम में जनता का कांग्रेस से मोहभंग हो रहा है और यदि जल्द ही स्थिति नहीं सुधरी तो कांग्रेस पच्चीस सीटों पर सिमट जाएगी। लेकिन राहुल गांधी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। नतीजतन, कांग्रेस छब्बीस सीटें ही जीत पाई। ऐसा ही लापरवाही भरा रवैया रहा तो बहुत जल्द कांग्रेस का बाकी बचे राज्यों से भी पत्ता साफ हो जाएगा।

’ललित मोहन बेलवाल, गौलापार, नैनीताल

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