विकास के बजाय - Jansatta
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विकास के बजाय

मानव द्वारा किए गए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कारण ही वैश्विक जलवायु में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है, जिसके कारण मानव सहित पूरे प्राणी जगत के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है।

Author नई दिल्ली | April 19, 2016 2:18 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

गांधीजी ने कहा था- ‘धरती पर सभी की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, उनके लालच के लिए नहीं।’ तेजी से खत्म हो रहे प्राकृतिक संसाधन, बढ़ रही आबादी, प्रदूषण के कारण पर्यावरण का बिगड़ता हुआ संतुलन और मनुष्यों पर उसके दुष्प्रभाव ने मानव जीवन के सामने एक संकट पैदा कर दिया है।

जिस तरह वैश्विक जनसंख्या बढ़ रही है और मनुष्य अपने स्वार्थ और हितों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है, उससे यही लगता है कि हम अपनी भावी पीढ़ियों के लिए एक ऐसी दुनिया छोड़ जाएंगे जो बिल्कुल खोखली होगी। वहां पीने के लिए न स्वच्छ पानी होगा, न रहने के लिए स्वच्छ वातावरण। आज कुछ देशों द्वारा कोयला और खनिज तेल जैसे सीमित संसाधनों का, जिनका नवीनीकरण नहीं होता है, इतनी तेजी से इस्तेमाल हो रहा है कि यह भी संदेह होने लगा है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बचेगा भी या नहीं। मानव जाति को यह समझना होगा कि प्राकृतिक संसाधन असीमित नहीं होते, इसीलिए उनका उपभोग सोच-समझ कर और भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर करना चाहिए।

हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में ‘अर्थ ओवरशूट डे’ 2014 की अपेक्षा छह दिन पहले आ गया है। बताया गया है कि पिछले पंद्रह वर्ष में ‘अर्थ ओवरशूट डे’ कैलेंडर में पहले खिसकता रहा है। सन 2000 में यह एक अक्तूबर को, पिछले वर्ष 19 अगस्त को और इस वर्ष 13 अगस्त को ही आ गया। इसका अर्थ है कि 2015 के लिए निर्धारित प्राकृतिक संसाधन को हम पहले ही खर्च कर चुके हैं।

पिछले कुछ दशकों में बड़े पैमाने पर जीवाश्म र्इंधन को जलाए और जंगलों को काटे जाने के बाद वायुमंडल में कार्बन डाईआॅक्साइड की मात्रा बढ़ गई है, जिससे वायुमंडल का तापमान भी बढ़ गया है। अगर इस प्रक्रिया को रोका नहीं गया तो पृथ्वी के ध्रुवों पर जमी बर्फ की चादरें पिघल जाएंगी, समुद्र तल ऊंचा हो जाएगा और समुद्र-तट से जुड़े प्रदेश पानी में डूब जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2015 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है। इसका प्रमुख कारण अलनीनो और ग्लोबल वार्मिंग बताया गया है। अलनीनो बारिश से जुड़ा है और इससे हमारे देश में मानसून की बारिश प्रभावित हो रही है। भूकंप के लिहाज से भी 2015 काफी संकटमय वर्ष रहा है।

मानव द्वारा किए गए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कारण ही वैश्विक जलवायु में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ है, जिसके कारण मानव सहित पूरे प्राणी जगत के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। धीरे-धीरे इस विकास के आड़ में हम अपने सहित पूरे प्राणी जगत के जीवन को खतरे में डाल रहे हैं। आज के समय में मानव को विकास के साथ-साथ विकास की संपोष्य अवधारणा को भी समझना होगा। (वेद प्रकाश, न्यू अशोक नगर, दिल्ली)
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शिक्षा का दायरा
समाज के निर्धन तबके को शिक्षा उपलब्ध कराना सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण दायित्व है। लेकिन बहुत दुख की बात है कि भीड़ भरे स्कूलों में बच्चे कु्रछ सीख नहीं रहे हैं। जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम और सर्वशिक्षा अभियान ने शिक्षा की गुणवत्ता में कितना सुधार किया, यह किसी से छिपा नहीं रह गया है। सघन दाखिला अभियानों के अंतर्गत राज्यों के प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी तो हुई, लेकिन इसके पीछे मकसद ज्ञान हासिल करना नहीं था, अधिकतर बच्चे दोपहर के भोजन के लालच में ही स्कूल आते थे।

स्कूलों में भोजन बनाने और बांटने में ही काफी वक्त बर्बाद होता है। अब समय गया है कि शिक्षकों को अध्यापन के साथ-साथ बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए उपक्रम करने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। बच्चों को मशीनी ढंग से पढ़ाना गलत है। प्राथमिक शिक्षा का नए सिरे से मूल्यांकन होना चाहिए। दरअसल, पिछड़े राज्यों के स्कूलों को संसाधनों की मदद के साथ उचित निगरानी की भी बहुत जरूरत है। (रमेश शर्मा, दिल्ली)
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बाघ का जीवन
बाघों के संरक्षण पर आयोजित तीसरे एशियाई सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने वन्यजीवों के संरक्षण की बात जोरदार ढंग से कही। किसी भी बात को जोशोखरोश के साथ रखना प्रधानमंत्री जी को खूब आता है। अब सरकार इस बात को लेकर कितनी गंभीर है, यह इसी बात से जाहिर है कि बेतवा और केन को जोड़ने में पन्ना टाइगर रिजर्व नष्ट हो जाने वाला है। हाल में एनजीटी ने पक्षी अभयारण्य से मानव बस्तियों की दूरी एक किलोमीटर से घटा कर मात्र सौ मीटर कर दी। यह क्यों किया गया, इसे समझा जा सकता है।

पिछले दो दशकों से हम बाघों को बचाने के लिए सरकारी और गैरसरकारी विज्ञापन प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में देखते आ रहे हैं। इस बीच में सन 2000 में अचानक बाघों की संख्या बहुत कम हो गई और फिर सरकारी प्रयास से तेजी से बढ़ी भी। बाघ संरक्षण से संबंधित विज्ञापन दिखाए जाते हैं तो जरूर जनता से इसमें सहयोग की भी अपेक्षा की जाती होगी। अब इस कार्य में जनता क्या सहयोग कर सकती है, इसे कोई भी समझ सकता है। (आनंद मालवीय, इलाहाबाद)
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समाज और संवाद
दिल्ली दुनिया का सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला शहर है और यहां जनसंख्या बढ़ने की दर भी सबसे ज्यादा है। जितनी जनसंख्या दिल्ली की निवासी है, उससे कई गुना अधिक लोग अनिवासी हैं, जो शिक्षा और रोजगार के सिलसिले में यहां रहते हैं। बढ़ती आबादी के खतरे ज्यादा इसलिए है कि संसाधनों का संकट तो है ही, उसके अलावा यह आबादी ही अपने आप में चलता-फिरता जानलेवा संकट है। अगर हजारों लोगों से भरी इमारत में किसी दुर्घटना की अफवाह ही फैल जाए तो जितने दुर्घटना से नहीं मरेंगे, उससे कई गुना ज्यादा एक दूसरे से कुचल कर मारे जाएंगे। किसी सार्वजनिक स्थल पर मची भगदड़ में तुरंत सैकड़ों जानें जाएंगी।

मेट्रो में ठुंसी लाखों की भीड़ को देखिए, महज एक तकनीकी गड़बड़ी हुई नहीं कि भगदड़ से हजारों की जानें जा सकती हैं। समस्या बढ़ती आबादी से ज्यादा यह है कि इस भीड़ में कोई आपसी संवाद नहीं है। सब एक दूसरे के लिए अजनबी बने हुए हैं, इसलिए खतरा है कि बिना किसी की सुने और माने सब तहस-नहस करते हुए दौड़ेंगे। दरअसल, हम इस शहर में लाखों की बढ़ती भीड़ में अनजान बन कर अकेले होते जा रहे हैं। सोचा जाए कि हम बढ़ रहे हैं या सिमट रहे हैं! (विनय कुमार, नई दिल्ली

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