निज भाषा

किसी भी देश की परिकल्पना हम उसके भाषायी आधार के साथ करते हैं और अगर उस देश की मातृभाषा के लिए चिंता करने की जरूरत पड़ने लागे, तो यह परेशान करने वाली बात है।

सांकेतिक फोटो।

किसी भी देश की परिकल्पना हम उसके भाषायी आधार के साथ करते हैं और अगर उस देश की मातृभाषा के लिए चिंता करने की जरूरत पड़ने लागे, तो यह परेशान करने वाली बात है। ऐसा क्यों होता है, कि जब कोई विशेष दिवस आता है, तभी हम उसकी विशेषता पर ध्यान देते हैं। उसी तरह आज हमारी मातृभाषा के साथ बर्ताव हो रहा है। आज पूरे भारत में भले ही हिंदी को राजभाषा और अधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त हो, लेकिन ये सिर्फ कहने भर के लिए है। आजादी के समय में भाषा का कितना महत्त्व था, यह हम उन महान क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ कर जान सकते हैं कि कैसे क्षेत्रीय भाषा का इस्तेमाल कर, उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई को एक ठोस रूप दिया। आज हमारी मातृभाषा पर किसी दूसरी भाषा का ज्यादा प्रभाव पड़ गया है। यह कहा भी जाता है कि अंग्रेज देश तो छोड़ कर चले गए, लेकिन भारत के लोगों के लिए तोहफे में कई ऐसी चीजें दे गए, जो आज बोझ बन चुकी हैं। हमारे देश की शिक्षा नीति भी अंग्रेजी को ही बढ़ावा देती है, क्योंकि वह लोगों को अवसर प्रदान करती है। हम अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करें, लेकिन उसकी जगह क्या हो?

अगर भारत के संदर्भ में अंग्रेजी भाषा को लेकर बात करें तो भारत के बहुत सारे राज्यों में हिंदी की नामोनिशान तक नहीं है। वहां अंग्रेजी में ही काम होता है। और तो और, किताबें अंग्रेजी में उपलब्ध हैं, नौकरी करने और बहुत सारे क्षेत्रों में अंग्रेजी को ही पहली पसंद के रूप में देखा जाता है। भले ही हिंदी हमारे लिए भावनाओं का मामला है, लेकिन अगर इससे हम अपना उपार्जन नहीं कर सकते, तो इसे हम कैसे देखें। सरकार भी इसे लेकर कभी गंभीर नहीं हुई और आज तक भावनात्मक रूप से जोड़ने वाली इस भाषा के लिए कुछ नहीं किया।

सरकार बड़े-बड़े दावे करती है कि हम हिंदी को तवज्जो देते हैं। सरकारी आदेश हों, चाहे कोई भी अधिसूचना हो, ये सभी हिंदी भाषा में ही डाली जानी चाहिए। लेकिन यह सब बातें हिंदी दिवस के विशेष मौके पर ही याद आती हैं। आज मातृभाषा का अस्तित्व सिर्फ पढ़ने के लिए रह गया लगता है, न कि रुचि के लिए। विद्यार्थियों को बड़े मंच पर हिंदी भाषा बोलने में शर्म आती है, लोग मातृभाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं। हिंदी भाषा को लेकर जो प्यार और जुनून हमारे देश के महान लेखकों में रही, अब वह नहीं दिखता है। हमारे देश में शिक्षा नीति में बदलाव हुआ है, उसमें यह देखना होगा कि नई शिक्षा नीति से हमारी मातृभाषा की स्थिति में कितना सुधार हो पाता है। हमारे देश की सरकार को चाहिए कि हिंदी भाषा को राज्यभाषा से राष्ट्रभाषा की ओर ले जाए, जिससे हमारी मातृभाषा का खोता वजूद वापस लाया जा सके।
’शशांक शेखर, आइएमएस, नोएडा, उप्र

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