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सुविधा की रेल

माना जा रहा है कि लगभग 98000 करोड़ की लागत की जापान के सहयोग से मुंबई और अमदाबाद के बीच प्रस्तावित बुलेट ट्रेन परियोजना भारत की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देगी।
Author नई दिल्ली | January 19, 2016 21:41 pm
बुलेट ट्रेन (फाइल फोटो)

इन दिनों जापान के सहयोग से मुंबई और अमदाबाद के बीच प्रस्तावित बुलेट ट्रेन चर्चा में है। माना जा रहा है कि लगभग 98000 करोड़ की लागत की यह परियोजना भारत की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देगी। लेकिन जरा व्यावहारिक ढंग से देखा जाए तो भारतीय रेलवे की प्राथमिकताओं में बुलेट ट्रेन से पहले यात्रियों की सुरक्षा, स्वच्छता, आधुनिकीकरण और दक्षता होनी चाहिए।

हर साल मानव रहित रेलवे क्रासिंग पर होने वाली दुर्घटनाओं में हजारों लोग अपनी जान गंवाते हैं। साधारण कोच में यात्री भेड़-बकरियों की तरह भरे होते हैं। यहां ट्रेनों का समय पर आना ही ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बन जाता है। ट्रेनों में मिलने वाले खाने की गुणवत्ता और साफ-सफाई पर तो जितना लिखा जाए कम ही है। क्या ऐसे में भारी लागत में बुलेट ट्रेन चलने के बजाय इन बुनियादी सुविधाओं को सुदृढ़ बनाने पर रकम खर्च नहीं होनी चाहिए?

और फिर जिस जोर-शोर से इस बुलेट ट्रेन का महिमामंडन किया जा रहा है, आखिर यह किसके लिए चलाई जा रही है? ठीक है कि बुलेट ट्रेन से मुंबई-अमदाबाद की आठ घंटे की दूरी दो घंटे में तय हो जाएगी पर यह तो अब भी हवाई जहाज से डेढ़ घंटे में तय हो जाती है। फिर भला उच्च आय वर्ग के यात्री, जिनके लिए प्राथमिकता समय है पैसा नहीं, वे भला बुलेट ट्रेन में क्यों बैठेंगे जब उतने ही पैसे में हवाई यात्रा कर सकते हैं? रही बात निम्न और मध्य आय वर्ग की, तो क्या वे 500 किलोमीटर की यात्रा पर 2800 रुपए खर्च करेंगे?

इस तरह स्पष्ट है कि बुलेट ट्रेन न तो रेलवे की बुनियादी समस्याओं को हल कर सकती है और न यह वित्तीय मापदंडों पर व्यावहारिक है। वास्तव में यह विशिष्ट आय वर्ग को यातायात का एक अतिरिक्त विकल्प भर प्रदान करती है जिसका रेल में सफर करने वाली नब्बे फीसद जनता के लिए कोई महत्त्व नहीं है। (अनिल हासानी, ओम नगर, भोपाल)

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मौत पर राजनीति
हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित के साथ जो हुआ उसे किसी भी तरह उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। पर इसका राजनीतिकरण करके किसी वर्ग,धर्म या संप्रदाय को गाली देना क्या ठीक है? सही है कि समाज में आज भी ऊंच-नीच का अमानवीय भेदभाव कायम है और यह हादसा उसी का नतीजा है। पर हर घटना को जाति और धर्म के चश्मे से ही क्यों देखा जाता है? ऐसे तमाम उदाहरण मिल जाएंगे जब आरक्षण की वजह से गैरआरक्षित वर्ग के होनहार बच्चों ने मौत को गले लगाया होगा। तब क्यों नहीं कहा जाता कि नहीं चाहिए आरक्षण, हम बराबरी से रहना चाहते हैं। दरअसल, दलित होना कोई पाप नहीं। पर इसके नाम पर रोना और किसी तबके को गरियाना भी कोई पुण्य का काम नहीं। (उत्कर्ष सिंह, आईआईएमसी, नई दिल्ली)

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जानलेवा सेल्फी
मुंबई में समुद्र के पास सेल्फी लेते हुए दो छात्राएं डूब गर्इं। ओंकारेश्वर में नर्मदा किनारे सेल्फी लेते हुए पैर फिसलने से डूब रहे युवक को बचाने में उसका भाई भी डूब गया। इससे पहले भी सामने से आती ट्रेन के साइड में खड़े होकर सेल्फी लेते समय टकराने से युवक की मौत हो गई थी। ऐसे ही और भी खतरनाक तरह से सेल्फी लेने के किस्से अक्सर अखबारों और टीवी चैनलों की खबरों में पढ़ने-देखने में आते रहते हैं। जोखिम भरे इस शौक में लोग अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। सेल्फी के शौकीन खतरों के खिलाड़ियों को ऐसे जानलेवा शौक से तौबा करनी चाहिए। (शकुंतला महेश नेनावा, गिरधर नगर, इंदौर)

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परिवर्तन की थाली
प्राथमिक विद्यालयों में मध्याह्न भोजन योजना की सफलता के विरोध में चाहे जो भी तर्क दिए जाते हों, लेकिन सच्चाई यह है कि इसने शिक्षा जगत में कई क्रांतिकारी परिवर्तनों की आधारशिला रखी। सामाजिक-आर्थिक असमानता के गर्त में समाए भारतीय समाज में एक ऐसा भी दौर था, जब भूखे-प्यासे बच्चे विद्यालयों की ओर नजर उठा कर भी नहीं देखते थे। उनका सारा समय तो गली-मुहल्लों और सड़कों पर आवारा घूमने या खेलने में ही बीत जाता था। लेकिन अब थाली लेकर ही सही, बच्चे विद्यालय तो पहुंच रहे हैं। सुखद बात यह कि ये बच्चे उपर्युक्त अभिशप्त परिस्थितियों से मुक्ति तो पा रहे हैं। विद्यालय में उपस्थित रहने से कुछ शब्द तो उनके कान में पड़ ही जाते हैं। साथ ही, प्रतिदिन विद्यालय जाने के लिए बच्चा अभ्यस्त तो हो ही रहा है। धीरे-धीरे समझ बढ़ेगी तो वह बच्चा उम्दा प्रदर्शन भी करेगा। नियमित विद्यालय जाने से वह न सिर्फ भोजन ग्रहण कर रहा है, बल्कि अनुशासन, खेल, सहयोग और सम्मान की भावना तथा नेतृत्व के गुण भी सीख रहा है।

दूसरी तरफ देखें तो मध्याह्न भोजन योजना के कारण बच्चे सामाजिक तौर पर परिपक्व हो रहे हैं। कम उम्र से ही ये धर्म, जाति, संप्रदाय और परिवार आदि में विभेद किए बिना साथ भोजन कर रहे हैं और खेल भी रहे हैं। इससे आने वाले समय में देश में सामाजिक-आर्थिक भेदभाव और असमानता की दीवारें निश्चित तौर पर टूटेंगी। (सुधीर कुमार, बीएचयू, वाराणसी)

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शिक्षा और सरोकार
आज शिक्षा को पैसा कमाने का जरिया बना लिया गया है। इसके उदाहरण हमें हर छोटे-बड़े शहर में देखने को मिल जाते हैं। प्राइवेट स्कूलों की तो जैसे बाढ़ आई हुई है जिनमें दो कमरों में चलने वाले और बड़े स्कूल शामिल हैं। लेकिन पढ़ाई कैसी हो, इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। अच्छे स्कूल के मायने तो बच्चों की रंगबिरंगी ड्रेस, अच्छे कमरे, खेल का बड़ा-सा मैदान और ज्यादा से ज्यादा होमवर्क ही रह गया है। गांधी और टैगोर का शिक्षा-दर्शन आज अंग्रेजी के दौर में नीचे खो गया है। शायद यही कारण है कि आज की शिक्षा बच्चों को सिर्फ डिग्री दे रही है, उन्हें अच्छा और संवेदनशील इंसान नहीं बना पा रही है।

आज इंग्लिश आना अच्छी शिक्षा का पर्याय है क्योंकि अच्छी नौकरी के लिए इंग्लिश जानना जरूरी है। इसका मतलब सिर्फ नौकरी के लिए पढ़ रहे हैं। आज की शिक्षा गैरबराबरी को और बढ़ा रही है। ऐसी शिक्षा से हम भविष्य के कैसे समाज की रचना कर रहे हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है? इसके दुष्परिणामों के लिए भी हमें तैयार रहना होगा। (प्रेरणा मालवीय, भोपाल)

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