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चौपाल : समझने का समय

अगर राजनीति घटिया दर्जे की होगी तो सामाजिक हालात के बढ़िया होने की उम्मीद करना बेमानी है।

Author March 23, 2017 05:35 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

समझने का समय

हम सबके यह समझने का वक्त आ गया है कि हर समाज के केंद्र में उसकी राजनीति होती है। अगर राजनीति घटिया दर्जे की होगी तो सामाजिक हालात के बढ़िया होने की उम्मीद करना बेमानी है। मुसलिम समाज मुख्तार जैसे नेता को जिता कर अपनी अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता का जश्न मना रहा था। भाजपा ने योगी को मुख्यमंत्री बना दिया तो अब यही समाज लानतें भी भेज रहा है योगी आदित्यनाथ पर। मतलब ‘मुख़्तार-ओवैसी गप-गप, योगी-मोदी थू-थू’! दरअसल, अभी तक मुसलिम समाज एक बात नहीं समझ पाया है कि अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता, बहुसंख्यक सांप्रदायिकता से नहीं लड़ सकती। जब एक गुंडा तुम्हारा शेर होगा तो बहुसंख्यक का शेर तुम्हारे शेर से कम क्यों हो? तुम मुसलिम होने के नाते एक होने, वोट देने की बात करोगे तो संघी हिंदू होने के नाते एक होने और वोट देने की बात क्यों न करें?

क्या यह कहना गलत होगा कि जज्बाती मुद्दों की सियासत में सबसे पहले उस मुसलिम राजनीतिक नेतृत्व को रखा जा सकता है जिसका बड़ा हिस्सा कुलीन यानी अशरफ वर्ग के मुसलमानों में से आता है। वह हमेशा भावनात्मक मुद्दों पर मुखर रहता है और गरीब विरोधी राजनीतिक तंत्र की संरचना के खिलाफ कभी कोई आवाज नहीं उठाता। आज अंसारियों (जुलाहों) की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है पर हमारे मुसलिम नेतृत्व के लिए यह कोई मुद्दा नहीं है। कुरैशी (कसाई) समाज लगातार प्रताड़ित हो रहा है पर हमारा मुसलिम नेतृत्व ‘तीन तलाक’ के मुद्दे पर तमाम सड़कों पर निकलेगा क्योंकि इस समाज का नेतृत्व जिनके हाथों में है वे मुसलिम समाज की आर्थिक-सामाजिक रूप से संपन्न जातीय पृष्ठभूमि से आते हैं। एक बात और समझने की है कि भारत में ‘सेक्युलरिज्म’ का अर्थ ‘मुसलिम तुष्टीकरण’ के रूप में किया जाता है। भाजपा आसानी से यह बात हिंदू मतदाताओं को समझा पा रही है। बड़ी बात यह है कि हिंदू मतदाता इस अर्थ को खारिज नहीं कर रहे।

अगर भाजपा के हिंदू बहुसंख्यकवाद से अन्य पार्टियों का अल्पसंख्यक सेक्युलरवाद टकराएगा, तो इस मुकाबले में जीतने वाले का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि सेक्युलरिज्म की नई व्याख्या जाति/ वर्ग की एकता के आधार पर हो जहां धार्मिक अल्पसंख्यकवाद का कोई स्थान न बचे। एक ओर हिंदू-मुसलिम दलित-पिछड़ों तो दूसरी ओर हिंदू-मुसलिम अगड़ों की सियासी एकता भारत में एक नई राजनीति का आगाज करेगी। पसमांदा आंदोलन इस ठोस हकीकत पर टिका हुआ है कि जाति भारत की समाजी बनावट की बुनियाद है। इसलिए सामाजिक-राजनीतिक विमर्श जाति को केंद्र में रख कर ही किया जा सकता है। हम मानते हैं कि किसी एक जाति की इतनी संख्या नहीं है कि वह अपने आपको बहुसंख्यक कह सके। जब कोई बहुसंख्यक ही नहीं तो फिर अल्पसंख्यक के कोई मायने नहीं रह जाते। जातियों/ वर्गों के बीच एकता ही एकमात्र उपाय है भारतीय समाज के हिंदूकरण या इस्लामीकरण को रोकने का।

अब्दुल्लाह मंसूर, जामिया विश्वविद्यालय

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