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चौपालः जुर्म और दंड

हाल ही में मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल ने बारह वर्ष तक की लड़की से बलात्कार करने पर फांसी की सजा की सिफारिश को मंजूरी दी है।

Author December 1, 2017 3:26 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

हाल ही में मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल ने बारह वर्ष तक की लड़की से बलात्कार करने पर फांसी की सजा की सिफारिश को मंजूरी दी है। यह कदम सराहनीय जरूर है पर यह भी स्पष्ट है कि यह फैसला दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं से उपजी आलोचनाओं से बचने के लिए लिया गया है। पीड़ितों के लिए यह महज कागजी कार्रवाई जैसा है क्योंकि केवल कानून में सुधार या नए कानून पास कर देने से स्त्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती। इसके लिए उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात होना भी जरूरी है।

जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ दुष्कर्म करता है या किसी और प्रकार की हिंसा करता है तो उसके मन में कानून का खौफ नहीं होता। खौफ इस बात का होता है कि आसपास उसे कोई रोकने वाला तो नहीं है। अधिकतर मामलों में ऐसा ही होता है। इन बलात्कारियों को रोकने वाला कोई नहीं होता। कई दफा प्रशासन और पुलिस का रवैया इसके लिए जिम्मेदार होता है। कई बार खुद पुलिस ही बलात्कारी बन जाती है। मुख्य समस्या अफसरशाही और नीयत में है, कानून में नहीं। महज कानून में सुधार काफी नहीं है। नीयत में भी सुधार होना चाहिए। केवल कागज पर लिखा कानून बलात्कारियों को रोकने में सक्षम नहीं है। पुलिस को भी संवेदनशील बनाना जरूरी है। इससे पुलिस वालों को पीड़ितों को समझने में मदद मिलेगी तथा वे उनके साथ संवेदनशीलता से पेश आएंगे।

एक अन्य बात जो महत्त्वपूर्ण है वह यह कि कैबिनेट का फैसला सख्त जरूर है मगर मुकम्मल नहीं है। इस संदर्भ में पीड़िता की उम्र की सीमा 12 वर्ष तक रखना एक विरोधाभास प्रकट करता है क्योंकि मध्यप्रदेश में उम्र के लिहाज से अधिकतर 16 से 30 वर्ष की स्त्रियां बलात्कार का शिकार हुई हैं। ऐसे में इन महिलाओं के लिए क्या किया गया यह स्पष्ट नहीं है। वहीं यह उम्र सीमा बलात्कार को दो वर्गों में विभाजित कर देती है जिसे उम्र सीमा के लिहाज से ‘वयस्क’ और ‘अवयस्क’ में भी विभाजित नहीं किया जा सकता। ऐसे में यह विभाजन किस प्रकार का है, समझ से परे है।

यदि वे बच्चों के यौन शोषण के प्रति चिंता जता रहे हैं तो इसे बढ़ा कर 12 से 16 वर्ष या 17 वर्ष क्यों नहीं किया जा सकता? हाल ही में कई ऐसे मामले आए जिनमें 12 से 15 वर्ष की बच्चियां बलात्कार की शिकार होकर गर्भवती हुर्इं। यहां तक कि उन्हें बच्चे को जन्म भी देना पड़ा। क्या इनके अपराधियों को फांसी की सजा नहीं होनी चाहिए?
अक्सर जब भी यौन हिंसा के मामले बढ़ने लगते हैं तो सरकारें सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात करने की बजाए कागजी कार्रवाइयां करने लगती हैं पर ये कार्रवाइयां व्यवहार में नहीं आ पातीं। अपराध के लिए क्या सजा हो, इससे ज्यादा जरूरी है कि अपराध होने से रोका कैसे जाए।
’सुकृति गुप्ता, नई दिल्ली

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