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चौपालः अर्थ अनर्थ

अफरा-तफरी के माहौल में बतौर आर्थिक पैकेज सरकारी राहतों का पिटारा खोल दिया गया। मगर जो पैकेज जीडीपी का दस फीसद बताया गया, वही जीडीपी आज बीस फीसद से भी काफी नीचे चला गया।

हाल के दिनों में जब देश की वित्तमंत्री ने इसका सहारा लिया तो लोगों के कान खड़े हो गए।

भारत के ज्यादातर लोग मानते हैं कि पूरी कायनात ही ‘एक्ट ऑफ गॉड’ के दायरे में आता है। इस जुमले का राजनीतिक इस्तेमाल करने का श्रेय दरअसल तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल को जाता है। हाल के दिनों में जब देश की वित्तमंत्री ने इसका सहारा लिया तो लोगों के कान खड़े हो गए। धर्म प्रधान देश में अमूमन हवन-कीर्तन से बड़े-बड़े संकटों को चुनौती देने की रिवायत रही है। जब देश में कोरोना वायरस फैलने लगा तो आनन-फानन में तरक्की के सारे दरवाजे बंद कर दिए गए। महीने भर बाद आए तालाबंदी के डरावने नतीजों से पैरों तले जमीन खिसकने लगी। अफरा-तफरी के माहौल में बतौर आर्थिक पैकेज सरकारी राहतों का पिटारा खोल दिया गया। मगर जो पैकेज जीडीपी का दस फीसद बताया गया, वही जीडीपी आज बीस फीसद से भी काफी नीचे चला गया। अब अपनी कमियों पर गौर करने के बजाय इस अर्थ अनर्थ को किसी पारलौकिक शक्ति पर न थोपा जाए तो क्या किया जाए! काश कि देश की आर्थिक व्यवस्था भगवान भरोसे चलती… तो शायद खुदकुशी से खुद्दारी तक की कहानियों से लोगो को बहलाना नहीं पड़ता!
’एमके मिश्रा, रांची, झारखंड

असुरक्षा की संविदा
हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने फैसला लिया है कि वह अब समूह ख और ग की सरकारी भर्ती पांच वर्ष की संविदा नियम पर करेगी। हालांकि अभी इस प्रस्ताव पर मंत्रिमंडल की अंतिम मुहर लगनी बाकी है, लेकिन इस प्रस्ताव के आने के बाद से ही लगातार सरकार के इस नियम की आलोचना हो रही है। विशेषकर सरकारी सेवाओं में जाने वाले विद्यार्थियों की नजर में यह बेहद घातक फैसला है। विद्यार्थियों का कहना है कि इस नियम के बाद उनके जीवन का एक दीर्घ काल इन सेवाओं की तैयारी करने में ही निकल जाएगा। इसके अलावा, इस नियम में और भी खामियां हैं। सरकार को ध्यान होना चाहिए कि हम संसदीय व्यवस्था में रहते हैं और इसके कारण स्थायी कार्यपालिका प्रभावित होगी। साथ ही इससे भ्रष्टाचार घटने के बजाय बढ़ेगा और राजनीतिक चाटुकारिता भी बढ़ेगी। फिर कार्यप्रणाली प्रभावित होगी, क्योंकि कर्मचारी को अपने पांच साल के कार्यकाल के अंतर्गत कुल बारह परीक्षाएं साठ फीसद अंकों के साथ उत्तीर्ण करनी होगी, जिसके कारण उसके ऊपर अतिरिक्त मानसिक दबाव पड़ेगा और वह अपने कर्तव्य के बजाय परीक्षा पर ध्यान देगा। अंतिम समस्या यह है कि इससे रोजगार सुरक्षा खत्म हो जाएगी। जिसके चलते कर्मचारी पर मानसिक तनाव और दबाव बढ़ेगा इसलिए सरकार को चाहिए कि वह इस प्रकार के निर्णय लेने से पूर्व संसदीय व्यवस्था को ध्यान में रखे।
’सौरव बुंदेला, भोपाल, मप्र

निष्ठा बनाम राजनीति
ठीक चुनाव के समय होने वाले दल-बदल से मतदाताओं के सामने विकल्पहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जिस नेता के कामकाज को लेकर उनकी नाराजगी थी, पार्टी और शीर्ष नेतृत्व के नाम पर वे फिर से उन्हें ही वोट देने को मजबूर हो जाते हैं। जहां गठबंधन की राजनीति होती है, वहां अक्सर चुनाव भी द्विध्रुवीय हुआ करते हैं। छोटे दल और निर्दलीय को वोट देना लोग अपने मत की बबार्दी मानते हैं। ऐसी स्थिति में परोक्ष तौर पर दल-बदल की स्थिति एक प्रकार से लोकतंत्र की हत्या है। लेकिन अवसरवादी राजनीति के दौर में या यों कहें कि एक-एक सीट की जुगाड़ में किसी दल अथवा गठबंधन को सिद्धांत की राजनीति याद नहीं आती। कार्यकर्ता बेचारे वर्षों तक धरना प्रदर्शन के जरिए पार्टी की सेवा करते हैं। इसका हाल का सबसे बड़ा उदाहरण बिहार है, जहां नीतीश कुमार की जदयू ने राजद के साथ मिल कर चुनाव लड़ा, अच्छी जीत हासिल की, बिहार में अपनी सरकार बनाई। फिर कुछ ही समय बाद वे भाजपा के साथ चले गए और फिर मुख्यमंत्री बने रह गए। उन्हें क्या फल मिलता है? एक सिद्धांतविहीन राजनीति पर हमारे दलों की निर्भरता दिन प्रतिदिन बढ़ ही रही है। आखिर इसे रोके कौन?
’मुकेश कुमार मनन, पटना, बिहार

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