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चौपाल: धनबल का चुनाव, दावे और हकीकत, गधों के साथ

चुनाव आयोग इसे उत्तर प्रदेश के अब तक के चुनावों में की गई सबसे ज्यादा जब्ती बता रहा है जबकि दो चरण का मतदान होना शेष है। यानी ये आंकड़े अभी और भी भयावह होने वाले हैं।

Author March 2, 2017 6:07 AM
प्रध

धनबल का चुनाव

चुनावी समर से गुजर रहे उत्तर प्रदेश में एक बार फिर सभी पार्टियां जनता से विकास के तमाम वादे कर रही हैं हालांकि ये विकास का जो रूप पेश कर रही हैं, वह भी विवादों के घेरे में है। इनके विकास के वायदे चुनावी झांसे से अधिक कुछ नहीं लग रहे हैं। आखिर कब्रिस्तान से ज्यादा श्मशान बना देना ही विकास है क्या? हाल ही में चुनाव आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की है जिसके मुताबिक उत्तर प्रदेश में कुल सात में से अब तक हुए पांच चरणों के मतदान तक, एक सौ सोलह करोड़ रुपए नकद पकड़े गए हैं। इसके अलावा विभिन्न पार्टियों के कार्यकर्ताओं से करीब अट्ठावन करोड़ रुपए की शराब और आठ करोड़ रुपए के मादक पदार्थ भी बरामद किए हैं। चुनाव आयोग इसे उत्तर प्रदेश के अब तक के चुनावों में की गई सबसे ज्यादा जब्ती बता रहा है जबकि दो चरण का मतदान होना शेष है। यानी ये आंकड़े अभी और भी भयावह होने वाले हैं।

समझ नहीं आता कि हमारे राजनेता आखिर किस मुंह से जनता का विकास करने की बात करते हैं! ये तो धन देकर जनता का वोट खरीदने की कवायद में लगे हुए हैं। सैकड़ों करोड़ रुपए की शराब और अन्य मादक पदार्थ जनता को पिला-खिला रहे हैं। ये क्या जनता का विकास करेंगे!
कहना न होगा कि चुनावों में दिन-पर-दिन बढ़ते जा रहे धनबल के इस दखल के लिए काफी हद तक हम मतदाता भी जिम्म्दार हैं। आखिरकार मतदाताओं द्वारा ली जाने वाली यह चुनावी घूस ही तो नेताओं को इस सबके लिए उत्साहित करती है।

नितीश कुमार आईआईएमसी, दिल्ली

दावे और हकीकत
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव पूरे प्रदेश में कहते घूम रहे हैं कि काम बोलता है। पर हकीकत इसके विपरीत है। इस सरकार में अधिकारियों ने राजमार्ग (हाईवे) सिर्फ कागजों पर बना कर करोड़ों रुपए डकार लिए हैं। यह कारनामा दिल्ली-सहारनपुर हाईवे (एनएच 57) के नाम पर हुआ है। अधिकारियों ने बैंक के साथ मिलीभगत करके यह हाईवे सिर्फ कागजों पर बना कर 455 करोड़ रुपए डकार लिए। सपा सरकार के कार्यकाल में किस तरह घोटालेबाजी की गई है, इस एक उदाहरण से इसका पता चल जाता है।

बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

गधों के साथ
समझ नहीं आता कि गधों को ढेर सारी खूबियों के बावजूद मनुष्यों की खामियां आंकने के लिए मापदंड क्यों बनाया जाता है? यह सब हाल में हो रहे विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान व्यापक तौर पर देखने को मिला है। अच्छा हुआ कि आज ‘एक गधे की आत्मकथा’ जैसी अमर कृति के लेखक कृश्न चंदर नहीं हैं वरना वे इस दीन-हीन प्राणी पर देश के राजनीतिकों के निरंतर हमलों से आहत होते। हमारे राजनीतिकों को अपने सियासी स्वार्थों में इस बेजुबान प्राणी को घसीटने बजाय उससे कर्मठता का संदेश ग्रहण करना चाहिए।

एससी कटारिया, महावीर नगर, रतलाम

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