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चौपालः दो साल

‘सबका साथ, सबका विकास’, ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ जैसे आकर्षक नारों, यूपीए सरकार की अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार व नकारात्मकता से त्रस्त मतदाताओं और मीडिया व संचार माध्यमों के प्रभावी प्रयोग ने लंबे अंतराल बाद एक दल की स्पष्ट बहुमत की सरकार का मार्ग प्रशस्त किया था और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ था।

Author May 27, 2016 3:12 AM
Pm मोदी

‘सबका साथ, सबका विकास’, ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ जैसे आकर्षक नारों, यूपीए सरकार की अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार व नकारात्मकता से त्रस्त मतदाताओं और मीडिया व संचार माध्यमों के प्रभावी प्रयोग ने लंबे अंतराल बाद एक दल की स्पष्ट बहुमत की सरकार का मार्ग प्रशस्त किया था और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ था। भारत जैसे विशाल व विविधतापूर्ण देश में किसी सरकार के दो वर्ष कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं ला सकते हैं पर यह समयावधि उसकी मंशा और दिशा को समझने के लिए पर्याप्त है। मोदी सरकार किसी भी खूबी/ उपलब्धि को अपनी या पहली बार बता कर श्रेय लेने और खामी के लिए साठ वर्षों की सरकारों को दोषी ठहराने की नीति पर चल रही है जबकि किसी भी वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धि के लिए दशकों पूर्व की नीतियां, क्रियान्वयन और सतत अनुसंधान का योगदान होता है। जब सरकार के एक व दो वर्ष पूरे होने पर जलसे की परंपरा शरू हो रही है तो नागरिकों को भी सरकार की नीतियों, क्रियान्वयन आदि का वस्तुनिष्ठ आकलन कर अपने निष्कर्ष सामने रखने चाहिए ताकि आत्ममुग्धता की अति के प्रति सावधान किया जा सके।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दामों में भारी गिरावट के बावजूद बेलगाम महंगाई, विशेष रूप से प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करने वाली खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि, रोजगारविहीनता,किसानों की अनवरत आत्महत्याएं, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं का लगातार महंगा होना, रुपए की कीमत घटना, सद््भाव को ठेस पहुंचाने वाले बयानवीरों पर अंकुश न लगाना, अपने चुनावी वादों को जुमले निरूपित करना, श्रमिक विरोधी कानून में संशोधन व निर्णय, साहित्यकारों / इतिहास वेत्ताओं / वैज्ञानिकों / विचारकों की अवहेलना व अवमानना जैसे अनेक कारण हैं कि सभी वर्गों का मोहभंग इतनी अल्पावधि में इस सरकार से हो गया है। ‘मन की बात’ कार्यक्रम हो या विदेशों में बसे भारतीयों के बीच राकस्टार की तरह के आयोजन हों, सब इकतरफा संवाद सिद्ध हुए हैं। पहले की सरकारों को दोष देने में प्रधानमंत्रीजी यह भी भूल जाते हैं कि इसमें तीन कार्यकाल अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व की सरकार के भी हैं और यह स्मरणीय है कि वाजपेयी के कार्यकाल में महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण रहा है।

देश में आर्थिक विषमता और बढ़ी है, अडानी की संपत्ति में हुआ इजाफा, प्रधानमंत्री की पीठ पर मुकेश अंबानी के हाथ के फोटोग्राफ, विजय माल्या का बैंकों के 9000 करोड़ रुपए हड़प कर लंदन भाग जाना, बकाया करों और बैंकों के एनपीए की वसूली के लिए ठोस पहल न किया जाना, औद्योगिक व व्यावसायिक घरानों को लगभग छह लाख करोड़ की कर व अन्य छूट बरकरार रखना, बैंक ब्याज दरों में कमी के लिए रिजर्व बैंक पर दबाव बनाना और सामान्यजन पर सेवा कर की दर व कर क्षेत्र का विस्तार कर भारी बोझ डालने के क्या संकेत हैं? सरकार किसकी पक्षधर है? मेक इन इंडिया से लाभ किसे होगा? क्या ये विदेशी कंपनियां मुनाफा कमा कर अपने देश में नहीं ले जाएंगी?
विदेश में विपक्ष का मजाक उड़ाना, सामरिक क्षेत्र में अमेरिका जैसे अविश्वसनीय देश से साझेदारी और बगैर निर्धारित कार्यक्रम के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के पारिवारिक आयोजन में शामिल होना, उसके बाद पठानकोट एयरबेस में आतंकी हमला, पाकिस्तानी जांच दल को अनुमति के बाद पाकिस्तान द्वारा भारतीय जांच दल को अनुमति न देना, नेपाल से टकराव, क्या विदेश नीति की सफलता के परिचायक हैं?

मोदी सरकार के कार्यकाल के तीन वर्ष शेष हैं, उन्हें 2020 और 2022 के बजाय 2019 तक के लक्ष्यों को जनता के सामने रखना चाहिए। योजना आयोग को नीति आयोग बनाने या अन्य संस्थानों-कार्यक्रमों के नाम बदल देने, मिथ को इतिहास व इतिहास को मिथ निरूपित करने से देश व समाज को कुछ हासिल नहीं होगा। स्वच्छ भारत अभियान, नमामि गंगे, मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप, स्टेंड अप के अभी तक के अनुभव कालेधन की वापसी जैसे नारे-जुमले ही दिखाई दे रहे हैं। आम धारणा में सरकार की छवि इवेंट मैनेजरों की बन रही है, समय रहते इस छवि को बदलना जरूरी है।
’सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

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