भूख से दो-चार

मौजूदा महामारी ने पूरी दुनिया को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया है।

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तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (Pixabay.com)

मौजूदा महामारी ने पूरी दुनिया को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया है। महामारी से आय का स्रोत खत्म हो जाने के कारण करोड़ों लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं। अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक, मध्य आयवर्गीय और गरीब देशों में 1.2 अरब लोगों के पास इस साल पेट भरने के लायक राशन नहीं होगा। यह संख्या पिछले साल के मुकाबले एक तिहाई अधिक है। संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में कहा था कि साल 2020 में वैश्विक खाद्य असुरक्षा पंद्रह साल के चरम पर पहुंच गई थी। महामारी के कारण आय प्रभावित होने से दुनिया की दस फीसद आबादी संतुलित या फिर कम से कम सेहत को दुरुस्त रख सकने वाले खानपान से वंचित हो गई है।

इस साल स्थिति और भी बदतर होने की आशंका है। सभी सामान के महंगे होने और आपूर्ति शृंखला के बाधित होने से खाद्य वस्तुओं की कीमत एक दशक के उच्चतम स्तर पर हैं। नेचर फूड जनरल के एक अध्ययन के मुताबिक, एशिया और अफ्रीका के गरीब और मध्य आयवर्गीय देशों में भुखमरी बढ़ने से राजनीतिक अस्थिरता का भी खतरा है।

अमेरिका से मदद पाने वाले सत्तर देशों में 1.2 अरब लोगों को इस साल खाने के लाले पड़ सकते हैं। यह इन देशों की कुल आबादी का इकतीस फीसदी है। महामारी से पहले यह संख्या 76.1 करोड़ थी। अमेरिकी कृषि विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल भुखमरी के कगार पर पहुंचने वाले अधिकतर लोग एशिया के हैं। खासकर बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान और इंडोनेशिया में ऐसे लोगों की संख्या काफी तेजी से बढ़ेगी, जिनके पास पर्याप्त भोजन तक नहीं होगा। यही स्थिति यमन, जिंबाब्वे और कांगो जैसे देशों की है, जहां अस्सी फीसद से अधिक आबादी के पास खाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं है।
’सदन, पटना विवि, बिहार

प्रकृति से खिलवाड़

हमारे देश में बाढ़, पहाड़ों और चट्टानों का दरकना हर साल की समस्याएं हैं। बारिश का मौसम शुरू होते ही जलभराव से या पहाड़ों के गिरने के समाचार आने शुरू हो जाते हैं। हर साल इस तबाही से जान-माल का बहुत नुकसान होता है। समाचार पत्रों में आफत की बारिश या मुसीबत की बारिश, शीर्षक से खबरें छपने लगती हैं। नेता हवाई दौरे करते हैं और मुआवजे का एलान करते हैं। हर साल यही प्रक्रिया निभायी जाती है। मदद के नाम पर खानापूर्ति की जाती है और उसके बाद सब भूल जाते हैं। सिर्फ वे लोग याद रखते हैं, जिनके परिवार का कोई सदस्य ऐसी तबाही का शिकार हुआ होता है। स्थायी समाधान निकालने का प्रयास नहीं होता।

सवाल यह उठता है कि इस तबाही और इसके जिम्मेदार कौन हैं? पहाड़ों और पेड़ों को काट कर होटल, रेस्टोरेंट किसने बनाए या बनने दिए हैं? देश में सैकड़ों तालाब थे। उन पर अवैध कब्जा करके बाजार और कॉलोनियां किसने बनाई या बनने दी हैं? गलियों या सड़कों पर कूड़ा-कचरा और प्लास्टिक की थैलियां कौन फेंकता है, जो हवा से उड़ कर या बारिश में बह कर नालों को जाम कर देती हैं? नालियों का यही जाम बारिश आने पर जलभराव का कारण बनता है।

पहाड़ों को काट कर, तालाबों पर अतिक्रमण करके होटल, बाजार और घर हम इंसानों ने अपने लालच में आकर बनाए हैं। जिन प्रशासनिक अधिकारियों पर यह सब रोकने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने भी अपने थोड़े फायदे के लिए यह सब होने दिया, जिसका परिणाम सबके सामने है। अगर हम अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रकृति से खिलवाड़ करेंगे तो प्रकृति पलट कर इसका जवाब देगी। जरूरत इस बात की है कि इंसान प्रकृति से उतना ही ले, जितनी उसे जरूरत है।
’चरनजीत अरोड़ा, नरेला, दिल्ली

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