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नतीजों के संदेश

बिहार विधानसभा के चुनाव हमेशा की तरह फिर असाधारण रहे। जितनी सुर्खियां इस चुनाव ने बटोरीं, उतना ध्यान शायद ही किसी अन्य चुनाव ने खींचा हो। दरअसल, यह लगभग..

Author नई दिल्ली | November 10, 2015 10:36 PM
पटना के एक मतदान केंद्र पर वोट देने के लिए लाइन में खड़ी महिलाएं। (पीटीआई फाइल फोटो)

बिहार विधानसभा के चुनाव हमेशा की तरह फिर असाधारण रहे। जितनी सुर्खियां इस चुनाव ने बटोरीं, उतना ध्यान शायद ही किसी अन्य चुनाव ने खींचा हो। दरअसल, यह लगभग डेढ़ वर्ष पुरानी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की पहली परीक्षा थी और परिणाम के हिसाब से वे इसमें फेल रहे। चुनाव आरंभ होने से पहले ही गठबंधन के बनने-बिगड़ने, तीसरे गठबंधन के निर्माण की कोशिश और इस दौरान होने वाली बयानबाजी ने पूरे वातावरण में उत्तेजना पैदा करने का काम किया। विकास की बात करने वाली भाजपा पहले दौर के बाद ही जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर मुड़ गई और नतीजा उनके विरुद्ध चला गया।

बिहार का चुनाव इस मामले में अन्य राज्यों से अलग होता है कि वहां के शिक्षित-अशिक्षित तमाम लोग राजनीतिक विचार मंथन में गहरी रुचि लेते हैं, राजनीतिक समीकरण के विभिन्न कोणों की पड़ताल भी करते हैं। ऐसी स्थिति में जुमलेबाजी से विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार नहीं हो सकती थी। जनता ने पिछले डेढ़ वर्षों के दौरान केंद्र सरकार की नीतियों और कामकाज को भी देख लिया था। तो उसने भाजपा को अवसर देने के बजाय नीतीश कुमार के देखे-परखे हुए शासन को ही मौका देने का फैसला लिया। चुनाव परिणाम से मोदी के मुख्य रणनीतिकार और पार्टी अध्यक्ष के रूप में अमित शाह की हैसियत डांवाडोल होगी, इसमें संदेह नहीं है।

बिहार की जनता हमेशा सत्ता के अहंकार के प्रतिरोध में खड़ी होती रही है और यह उसने फिर से सिद्ध कर दिखाया है। इसलिए यह जीत अपेक्षित और संभावित था, जिसे पकड़ने में धुरंधर राजनीतिक विश्लेषक और भाजपा के नेता विफल रहे। यह परिणाम देश की राजनीति को नए सिरे से पुनर्नियोजित करेगी। (समरेंद्र कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, दिल्ली विवि)

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असुविधा की सड़क

औद्योगीकरण और नगरीकरण के साथ परिवहन के निजी साधनों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हुई है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि सिर्फ बड़े ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों में भी थोड़ी-सी ट्रैफिक बढ़ते ही पूरा शहर रेंगने पर मजबूर हो जाता है। इस स्थिति में जाम में फंसा व्यक्ति ध्वनि और वायु प्रदूषण की चपेट में आकर बेवजह स्वास्थ्य पर जोखिम मोल लेता है। काम पर जाने वाले लोगों के लिए यह रोज की बात हो गई है।

देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद दो और चारपहिया वाहनों की संख्या में काफी तेजी से वृद्धि हुई है। इस बीच जाम की बढ़ती समस्या के बीच वायु और ध्वनि प्रदूषण ने मानव-स्वास्थ्य का खूब नुकसान भी किया है। बावजूद इसके ज्यादातर व्यक्ति अब यथाशक्ति निजी वाहन रखने को आमादा है। नागरिकों की इस महत्त्वाकांक्षा के कारण पर्यावरण की बलि चढ़ रही है। दिनोंदिन प्रदूषित होते वातावरण में चंद मिनटों की चैन की सांस लेना दूभर होता जा रहा है। जाम के झाम के चक्कर में फंसा कोई रोगी अंतिम सांसें ले रहा होता है, तो किसी जरूरी काम के लिए घर से निकला व्यक्ति बस अपनी किस्मत को कोसता रह जाता है! घंटों जाम के दौरान जिंदगी मानो थम-सी जाती है। बेतरतीब पार्किंग के चलते ऐसी समस्या अब आम हो चुकी है।

किसी देश का परिवहन उस देश के आर्थिक विकास की धमनी होता है। कृषिगत और औद्योगिक उत्पादनों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के साथ-साथ यह यात्रियों को सुलभ सेवाएं प्रदान करता है। बहरहाल, जिस तरह बीते दिनों दिल्ली में ‘कार फ्री डे’ मनाया गया, उसी तरह हमें सार्वजनिक वाहनों का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए और संभव हो तो छोटी दूरी तय करने के लिए साइकिल की सवारी ही करना चाहिए। इस दिशा में एक सार्थक पहल मौजूदा हालात बदल सकते हैं। (सुधीर कुमार, बीएचयू, वाराणसी)

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जनतंत्र की परंपरा

बिहार में क्रांतिकारी परिवर्तनों की जैसी ऊर्जा पिछले ढाई हजार साल के दौरान दिखी है, वह किसी दूसरे प्रदेश में नहीं रही। भगवान बुद्ध और महावीर से लेकर आज तक की परंपरा ने बताया है कि यहां के समाज ने क्या भूमिका निभाई है। आजादी के आंदोलन में भूमिका के बाद से आधुनिक दौर में संपूर्ण क्रांति और फिर धार्मिक सद्भाव को खत्म करने की कोशिश करती भाजपा की रथयात्रा को लगाने का काम बिहार में ही हुआ था। आज जहां देश की जनता दुखी है महंगाई और गलत नीतियों से, वहां आरएसएस और भाजपा द्वारा सत्ता के लिए देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को तबाह करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। इन्हें यह समझ नहीं कि नफरत के बीज बोकर लाशों की ही फसल काटी जा सकती है।

ऐसे में तब बिहार ने फिर एक बार विभाजनकारी घृणित राजनीति पर प्रहार करने का काम किया है। बिहार के मतदाताओं ने अपने फैसले से तय किया है कि जुमले और झांसे की राजनीति लंबी नहीं होती। धार्मिक उन्माद फैला कर नफरत की राजनीति टिकाऊ नहीं है। देश में जनवादी और समाजवादी राजनीति का ही भविष्य है। बिहार के मतदाताओं की राजनीतिक सूझबूझ और फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए। मतदाताओं के इस फैसले से देश की राजनीति के लिए नया रास्ता खुलेगा। बिहार के जनता के फैसले से जनतंत्र की जीत हुई है। (उमेश तिवारी, सीधी, मध्यप्रदेश)

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काम का विकास
डेढ़ साल पहले देश भर में भाजपा की बहार के बाद बिहार की हार ने बता दिया कि देश को नेताओं से काम का विकास चाहिए, न कि बेमानी बातों का विकास! (महेश नेनावा, इंदौर, मध्यप्रदेश)

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