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हाशिये पर मजदूर

महानगरों में बने ऊंचे भवन बड़े-बड़े माल, मेट्रो जैसी सुविधाएं जो शहरवासियों को मिल रही हैं, कहीं न कहीं प्रवासी मजदूरों के योगदान का नतीजा हैं।

जब आप शहरों में अपने दफ्तरों के लिए निकलते हैं तो अक्सर पाते होंगे कि कुछ व्यस्त चौराहों पर काफी मजदूर खड़े होते है, जिसे हम अमूमन प्रवासी मजदूर कहते हैं। शहर और महानगरों की चमचमाती सफलता के पीछे इन मजदूरों का बड़ा योगदान है। महानगरों में बने ऊंचे भवन बड़े-बड़े माल, मेट्रो जैसी सुविधाएं जो शहरवासियों को मिल रही हैं, कहीं न कहीं प्रवासी मजदूरों के योगदान का नतीजा हैं। लेकिन जब इन प्रवासी मजदूरों की स्थिति और उनके अधिकारों की बात आती है तो हमें बड़ा अफसोस होता है कि इनका जीवन दयनीय हालात में गुजरता है। ये मजदूर अपने गांव-कस्बों की जिंदगी को छोड़कर शहरों में रोजगार की तलाश से आते हैं कि शायद वहां वे एक आदर्श जीवन बिता सकेंगे।

मगर समय के साथ बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी ने उन्हें फिर गरीबी के दलदल में धकेल दिया। हमें बताने की आवश्यकता नहीं है कि करोना काल में किस तरीके से इन्होंने भयानक विपत्ति का सामना किया। बावजूद इसके आज भी उनकी हालत पर किसी भी सरकार का ध्यान नहीं है, वह चाहे केंद्र की हो या राज्य की। जिस राज्य से आते हैं वहां की सरकार एवं प्रवासी मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है, जहां उनका बहुस्तरीय शोषण होता है।

प्रवासी मजदूरों के एक बड़ी समस्या है, इनके लिए आवासों का न होना। अगर कभी इनके आवासों में जाकर देखा जाए तो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की रूह कांप जाएगी। वहां पानी-बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं भी कई बार उपलब्ध नहीं होती हैं। साथ ही गंदगी का जमावड़ा अलग होता है। समय से वेतन मिलता है या नहीं, इसका कोई ठिकाना नहीं। इन्हें आर्थिक और काम की सुरक्षा का हमेशा अभाव रहता है और ये ठेकेदारों की दया पर निर्भर रहते हैं, जिसके चलते इनका नाना प्रकार से शोषण होता है। सरकार और स्थानीय प्रशासन के पास कोई ऐसे आंकड़ा नहीं है, जो इस समय तय कर पाए कि इनको तय मजदूरी के हिसाब से मजदूरी दी भी जा रही है या नहीं।

इन मजदूरों को अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी रहती है, विशेषकर महिलाओं के संदर्भ में। जिन शहरों में प्रवासी मजदूर काम कर रहे हैं, अगर वे सोचते हैं कि अपने बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा दिलाएं तो यह उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है। उनके लिए बेहतर और कम खर्च वाली स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं होती हैं। जो महंगी चिकित्सा की व्यवस्था है भी तो उनकी पहुंच वहां तक नहीं है। रोजी-रोटी के अवसर बेहद कम होते जा रहे हैं।

आमतौर पर मजदूरों को ऐसे समय से भी गुजरना पड़ता है कि जब उन्हें कई दिनों तक काम भी नहीं मिलता है, जिसके चलते इनकी हालत और भी बदतर हो जाती है। परिवार का खर्च, मकान का किराया कहां से आएगा, इस चिंता के बारे में केवल वही समझ सकते हैं। जब इन प्रवासी मजदूरों के पास आर्थिक स्रोतों का अभाव हो जाता है तब उनके साथ मनमाने तरीके से व्यवहार किया जाता है, शोषण के दुश्चक्र में फंसा दिया जाता है। इसलिए सरकारों को ध्यान देना होगा कि वह इस वर्ग को हर स्तर पर सुरक्षा प्रदान करे। तभी जाकर हम विकासवादी जैसे महत्त्वाकांक्षी सपने को साकार कर सकेंगे।

  • सौरव बुंदेला, भोपाल

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