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सूखे का संकट

लातूर सूखे की सबसे ज्यादा चपेट में है जहां जलाशयों के आसपास धारा 144 लगा दी गई

Author नई दिल्ली | April 22, 2016 2:47 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

इन दिनों देश के कई हिस्सों में भयंकर सूखे की स्थिति बनी हुई है। लातूर सूखे की सबसे ज्यादा चपेट में है जहां जलाशयों के आसपास धारा 144 लगा दी गई और लोगों को पीने का पानी भी रेल से मुहैया कराया जा रहा है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के साथ कुछ अन्य इलाकों में भी पानी की कमी है जिससे कृषि पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ने वाला है। सीधे तौर पर इस कमी से किसान प्रभावित होंगे और पैदावार कम होने के कारण खाद्य सामग्री की दरों में भी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी जिससे अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी। इन सभी हालात के बाद मौसम विभाग ने बताया कि इस वर्ष अच्छी बारिश होने की उम्मीद है जिसे आशा की एक किरण के तौर पर देखा जा रहा है।

हम जानते हैं कि हमारे देश में मानसून आता है तो कई इलाकों में भारी बारिश होती है और बहुत ज्यादा पानी बह कर चला जाता है। हर साल बाढ़ के कारण लाखों लोग प्रभावित होते हैं और करीब पांच सौ अरब रुपए से ज्यादा का सालाना नुकसान होता है लेकिन दूसरी ओर हम देखते हैं कई इलाके सूखे की चपेट में आ जाते है, लोगों को पीने तक का पानी भी नसीब नहीं होता। प्रकृति की इस असमानता को देखने के लिए एक घटना याद आती है कि अगस्त 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ओडिशा के सूखा प्रभावित इलाकों का दौरा इसलिए नहीं कर पाए कि भारी बारिश से उनका हेलीकॉप्टर भुवनेश्वर से उड़ान नहीं भर पाया। इसमें हम देखते हैं कि एक ही राज्य के एक हिस्से में भयंकर सूखा है तो दूसरे भाग में भारी बारिश। प्रकृति कहां मेहरबान होगी और कहां नाराज इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता और न ही इस पर सरकार का कुछ बस है। जंगल, पहाड़ नष्ट हो रहे हैं, प्रदूषण भी महत्त्वपूर्ण मुद्दा है जो पूरी तरह से सरकारों के अधीन है लेकिन इनके उपाय के तौर पर कुछ होता नजर नहीं आ रहा है।

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प्रकृति की असमानता से निपटने के लिए 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने देश की सभी नदियों को आपस में जोड़ने की योजना बनाई थी जिसका मुख्य उद्देश्य था कि सभी नदियों को आपस में जोड़ने से ज्यादा बारिश वाले इलाकों का पानी नदियों के माध्यम से सूखा प्रभावित क्षेत्रों की ओर चला जाएगा जिससे बाढ़ और सूखा दोनों ही समस्याओं से कुछ निजात मिल सकती है। इससे वर्षा जल का सरंक्षण भी होगा और उसका सही उपयोग भी संभव हो पाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस योजना की महत्ता को देखते हुए एक कमेटी बनाई है जो इस योजना के नफे नुकसान के साथ ही इसे कैसे लागू किया जाए, इसके बारे में भी सरकार को सुझाव देगी।

अभी हम सूखे की मार झेल रहे हैं और पिछले दिनों तमिलनाडु, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड में बाढ़ की समस्याओं से गुजर चुके हैं। इन सभी दृश्यों को देखने के बाद हमारी सरकारों को धूल खाती फाइलों में दबी नदियों को जोड़ने वाली परियोजना के बारे में सोचना चाहिए और जल्द ही उसका खाका जनता के सामने रखना चाहिए। इस योजना को एक साथ पूरे देश में लागू करना तो बहुत मुश्किल है लिहाजा, छोटे-छोटे चरणों में प्राथमिकता के आधार पर इसे लागू किया जा सकता है। (सूरज कुमार बैरवा, सीतापुरा, जयपुर)
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नुकसान किसका

जाट आंदोलन की आग ठीक से शांत भी नहीं हुई है कि पाटीदार आंदोलन ने फिर से अपना फन उठा लिया है। सवाल यह है कि आंदोलन की इस आग में आखिर नुकसान किसका हो रहा है? लोग सड़क पर उतर कर अंधाधुंध आगजनी कर सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने लगते हैं। वे भूल जाते हैं कि इन सार्वजनिक संपत्तियों में उन्हीं के खून-पसीने की कमाई(टैक्स के रूप)लगी है।

एक बात समझ नहीं आती कि आखिर लोगों की नाराजगी किसके प्रति है। अगर उनका गुस्सा केंद्र या राज्य सरकार से है तो सीधे जाकर संसद या मुख्यमंत्री के आवास पर धरना और प्रदर्शन करना चाहिए। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सरकार उनकी मांगें या स्वीकार कर लेगी या फिर जरूरी कार्रवाई कर ऐसे लोगों की अक्ल ठिकाने लगा देगी। इससे आंदोलनकारियों के समय की भी बचत हो जाएगी। (तौहीद आलम, दिल्ली)
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कलह का फल
पहले अरुणाचल प्रदेश और फिर उत्तराखंड में सरकार धराशायी होने से कांग्रेस की कलह सतह पर आ गई है। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली सरीखे गढ़ों में लगी सेंध के सदमे से पार्टी लगता है, उबर नहीं पा रही है। संसद में हंगामे और विरोध की खानापूर्ति को छोड़ दिया जाए तो संगठन के स्तर पर प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रही है, जिसके लिए वह दशकों से जानी जाती थी। पार्टी में जो एक सक्षम नेतृत्व होना चाहिए, उसका संकट अरसे से चल रहा है। संगठन में प्रतिनिधि पशोपेश में रहते हैं कि वे सोनिया की शरण में जाएं या राहुल के साथ रहें।

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद लगा कि कांग्रेस में बदलाव आएगा और मजबूत नेतृत्व की दिशा में बढ़ जाएगा पर अभी तक कोई बदलाव नहीं आया। राज्यों में भी पार्टी में विभाजन दिख रहा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में नेताओं के अलग-अलग धड़े बने हुए हैं। सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वफादार नेता आगे आकर खुली आलोचना से बच रहे हैं, वे दबे-छिपे जरूर कहते हैं कि पार्टी के हालात ठीक नहीं। (शुभम सोनी, इछावर, मध्यप्रदेश)
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सियासी शक्तिमान
उत्तराखंड में विधायकजी की कथित नृशंसता का शिकार हुए घोड़े शक्तिमान की मौत हो गई है। जो राजनीति पहले से उबाल पर थी, अब खौलने लगी है। एक बेजुबान की मौत का फायदा उठाने में दोनों पार्टिया लगी हुई हैं। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने मौका कोई भी चूकना नहीं चाहता। कांग्रेस, भाजपा को इस मौत के लिए जिम्मेदार बताकर सियासी फायदा उठाने के चक्कर में है तो भाजपा इसका कारण इलाज में लापरवाही बता कर जान बूझ कर शक्तिमान को मरने देने का आरोप लगा रही है। हालांकि विधायकजी पशु क्रूरता निवारण आधिनियम के तहत जेल की हवा खा चुके हैं, जहां से तीन दिनों में ही वे जमानत पर बाहर आ गए थे। सवाल है कि क्या शक्तिमान की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों पर उचित कार्रवाई की जाएगी या फिर सियासी लाभ उठाने के बाद मुद्दा ही खत्म कर दिया जाएगा। (जितेंद्र कुमार, बाराबंकी)

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