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चौपाल: प्रदूषण पर्व

कुछ समय पहले यह खबर चर्चा में थी कि इस बार रिकॉर्ड तोड़ दोपहिया और चारपहिया वाहनों की बिक्री हुई। अब ये वाहन कोई घर में सजा कर रखने के तो हैं नहीं, सड़कों पर दौड़ेंगे, प्रदूषण बढ़ाएंगे। फिर प्रदूषण बढ़ेगा तो हम पराली का रोना-धोना शुरू कर देंगे, जो पराली निर्धारित समय पर केवल महीने या पंद्रह दिन ही धुआं फैलाती है। ये वाहन तो रोज ही अपना धुआं उगल कर प्रदूषण बढ़ाएंगे।

air pollutionवायु प्रदूषण से लोग परेशान। फाइल फोटो।

दिल्ली में दीपावली के दिन इतने पटाखे छोड़े गए कि प्रदूषण का पिछले चार साल का पुराना रिकॉर्ड टूट गया। जिन शहरों या नगरों में पटाखे फोड़ने पर प्रतिबंध था, वहां भी प्रतिबंध की सरेआम धज्जियां उड़ीं। सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति में प्रदूषण की समस्या कैसे कम हो? दुख इस बात का नहीं है कि दीपावली के दिन धूम-धड़ाके से पटाखे फोड़े गए, गम इस बात का है कि प्रदूषण की बीमारी का जितना इलाज कर रहे हैं, उससे दोगुना उस बीमारी को हम अपनी गैरजिम्मेदाराना कार्य से बढ़ा रहे हैं। फिर दुखी भी हम होते हैं, बीमार भी हम होते हैं, रोना भी हम रोते हैं। ऐसे में बीमारी का इलाज कैसे होगा?

कुछ समय पहले यह खबर चर्चा में थी कि इस बार रिकॉर्ड तोड़ दोपहिया और चारपहिया वाहनों की बिक्री हुई। अब ये वाहन कोई घर में सजा कर रखने के तो हैं नहीं, सड़कों पर दौड़ेंगे, प्रदूषण बढ़ाएंगे। फिर प्रदूषण बढ़ेगा तो हम पराली का रोना-धोना शुरू कर देंगे, जो पराली निर्धारित समय पर केवल महीने या पंद्रह दिन ही धुआं फैलाती है। ये वाहन तो रोज ही अपना धुआं उगल कर प्रदूषण बढ़ाएंगे। आखिर हम समस्या का इलाज तो करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ हमारी इस प्रकार की यह गैरजिम्मेदारी से समस्या ज्यों की त्यों ही बनी रहती है। फिर प्रदूषण पर रोना ही क्यों?

’हेमा हरि उपाध्याय अक्षत, उज्जैन, मप्र

रूस की राह

जब कभी तानाशाह देशों की बात होती है, तो हमारी अंगुली सबसे पहले चीन पर उठती है। उसके बाद नंबर आता है उत्तर कोरिया, सऊदी अरब, जॉर्डन और वियतनाम आदि का। मगर अब जिसका नाम हमें लेना चाहिए, उसे हम आमतौर पर छोड़ देते हैं। मेरे विचार से वह देश है रूस, जो 1990 के दशक से लोकतांत्रिक उदारवाद का नकली चादर ओढ़े घूम रहा है, जबकि सबसे बड़ा एकतंत्रवादी देश वही है।

कुछ माह पहले वहां रायशुमारी करा कर यह तय कराया गया कि 2024 के बाद भी पुतिन अगले दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति बने रहेंगे। बीते मंगलवार को वहां के सदन ड्यूमा में नया विधेयक पारित किया गया, जिसके तहत पुतिन और उसके परिवार पर आजीवन कोई मुकदमा नहीं चलेगा। क्या ये लोकतांत्रिक कदम है? कुछ सप्ताह पहले ही विपक्षी नेता अलेक्सी नवेलनी को जहर देकर मारने की कोशिश की गई थी। ऐसे अनेक कारण हैं, जिनकी वजह से रूस को एकतंत्रवादी देश की श्रेणी में माना जाना चाहिए।
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड

जड़ता का हासिल

‘अंधविश्वास की जकड़न’ (संपादकीय, 18 नवंबर) पढ़ कर एकबारगी मन व्यथित हो उठा। ऐसा महसूस हुआ जैसे आज भी हम आदिम युग में जी रहे हैं। सवाल उठता है जिस देश में शिक्षण संस्थान से ज्यादा धार्मिक स्थल हों, अक्षर ज्ञान बिना ईश्वर वंदना के तौर-तरीके सिखाया जाना अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता हो, साथ ही यह बताया जाता हों कि श्रद्धा, आस्था, विश्वास के लिए पढ़ना जरूरी नहीं है, वहां इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं तो अचरज कैसा? माना कि आस्था की राह में अक्षर ज्ञान महत्त्वपूर्ण नहीं है।

फिर धर्मज्ञ को चाहिए कि वह अंधविश्वास न परोसे। यक्ष प्रश्न यह है कि अगर अंधविश्वास की गिरफ्त में अनपढ़ हैं, तब तो बात समझ में आती है। मगर पढ़े-लिखे लोग भी इसके शिकार हों तो यह किसकी गलती है? संविधान में नीति निर्देशक सिद्धांत दिए गए हैं। हालांकि यह किसी भी सरकार के बाध्यकारी नहीं है। लेकिन विभिन्न सरकारों द्वारा इन निर्देशक तत्त्वों पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा गया, जिसके नतीजे इस रूप में सामने आते हैं।
’मुकेश कुमार मनन, पटना, बिहार

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