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गांधी की जरूरत

गांधी की चेतना त्रिवेणी चेतना है जो बुद्ध की करुणा, महावीर की अहिंसा और ईसा की प्रेम की धारा से अनुप्राणित है। गांधी की दृष्टि में राजनीति की कसौटी छोटे से छोटे आदमी को राजनीति का लाभ पहुंचाना रही है। उन्होंने दूसरों की पीड़ा समझने वालों को वैष्णव जन माना है। सत्य, अहिंसा, करुणा और […]

Author Published on: January 30, 2015 3:56 PM

गांधी की चेतना त्रिवेणी चेतना है जो बुद्ध की करुणा, महावीर की अहिंसा और ईसा की प्रेम की धारा से अनुप्राणित है। गांधी की दृष्टि में राजनीति की कसौटी छोटे से छोटे आदमी को राजनीति का लाभ पहुंचाना रही है। उन्होंने दूसरों की पीड़ा समझने वालों को वैष्णव जन माना है।

सत्य, अहिंसा, करुणा और प्रेम के इस पुजारी को आज ही के दिन (30 जनवरी 1948) प्रार्थना सभा में जाते समय नफरत और संकीर्णता की विचारधारा के प्रतीक नाथूराम गोडसे ने गोलियों से छलनी कर दिया। आजाद हिंदुस्तान में आतंकवाद का पहला शिकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ही हुए।

समाजवादी विचारक डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने तीन तरह के गांधीवादी बताए थे- सरकारी गांधीवादी, मठी गांधीवादी और कुजात गांधीवादी। उन्होंने खुद को कुजात गांधीवादी की श्रेणी में रखा था। लेकिन आज एक चौथी श्रेणी और उभरती दिखाई दे रही है जिसे दोमुंहे गांधीवादी कहा जा सकता है। गांधी की विरासत पर कब्जे के लिए आतुर इस श्रेणी के लोगों का एक मुख गांधी की प्रशस्ति गाता है तो दूसरा मुख गोडसे को प्रतिष्ठित करता है! मुंह में गांधी, बगल में गोडसे!

यह एक खतरनाक समय है जब धार्मिक संकीर्णता, सांप्रदायिक कट्टरता, वैचारिक असहिष्णुता, जातीय विद्वेष और आतंकवाद चरम पर हैं। रोजगारहीन विकास, पर्यावरण विनाशी विकास, बाजारवाद और परावलंबी अर्थव्यवस्था ने जीवन मूल्यों/ मानवीय मूल्यों के समक्ष गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे कठिन समय में गांधी के विचार को गहराई और ईमानदारी से समझ कर आधुनिक संदर्भ में व्यावहारिक स्तर पर अपनाने की सबसे ज्यादा जरूरत है।

समाजवादी विचारक और स्वतंत्रता सेनानी मामा बालेश्वर दयाल से लंबी चर्चा के अवसर पर मैंने गांधीवाद पर सवाल किया था। मामाजी का जवाब ‘गांधी का वाद तो आचरण में है’ बार-बार याद आता है।

 

सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

 

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