mahatma gandhi death anniversary: gandhi never impose of his Idea or thought on Public - Jansatta
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चौपालः गांधी के प्रति

‘हे राम’ के साथ अंतिम विदा लेने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तब फिर प्रासंगिक हो जाते हैं जब समाज हिंसा, मूल्यहीनता और गैर बराबरी के पथ पर अग्रसर होता है।

Author January 30, 2018 5:12 AM
बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के चलते साधनों की पवित्रता की अनदेखी की जा रही है, विचारधारा को थोपा जा रहा है, ऐसे में गांधी की याद आना स्वाभाविक ही है। उनकी पुण्यतिथि तीस जनवरी को ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाना एक रस्मअदायगी से ज्यादा कुछ नहीं रह गया है।

‘हे राम’ के साथ अंतिम विदा लेने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तब फिर प्रासंगिक हो जाते हैं जब समाज हिंसा, मूल्यहीनता और गैर बराबरी के पथ पर अग्रसर होता है। गांधी ही वे पहले नेता थे जिन्होंने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के साथ ट्रस्टीशिप और साध्य के साथ ही साधनों की पवित्रता जैसी जीवनोपयोगी व्यावहारिक बातों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने अंधराष्ट्रभक्ति और विजयोन्माद में देश की जनता पर मनमाने निर्णय थोपने का कभी समर्थन नहीं किया।

आज जबकि समाज में भौतिकता की होड़ बढ़ती जा रही है, असमानता की खाई निरंतर गहरी होती जा रही है, बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के चलते साधनों की पवित्रता की अनदेखी की जा रही है, विचारधारा को थोपा जा रहा है, ऐसे में गांधी की याद आना स्वाभाविक ही है। उनकी पुण्यतिथि तीस जनवरी को ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाना एक रस्मअदायगी से ज्यादा कुछ नहीं रह गया है। आज गांधी की प्रतिमाओं पर फूलमाला पहनाने या दो मिनट का मौन रखने से ज्यादा उनके विचारों को व्यवहार में लाने और अन्याय, अत्याचार के खिलाफ मुखर होने की जरूरत है। इस देश को दुष्टों की दुष्टता से ज्यादा खतरा सज्जनों की निष्क्रियता से है।

अन्याय सहने वाला भी अन्याय करने वाले के समान ही दोषी है। गुलामी के दौर के नेता भी अगर हमारी तरह ‘अपने को क्या करना’ सोच कर चुप रहते तो क्या यह देश कभी आजादी हुआ होता! बहाव में बहते हुए या छोटे-मोटे भय से डर कर चुप रहने से अपनी बात विनम्रतापूर्वक साफगोई से रखना कहीं बेहतर है। विनम्रता का मतलब कायरता नहीं है। अगर आप देश और समाज में कुछ गलत होता हुआ देख रहे हैं, उसमें कुछ बदलाव चाहते हैं तो मुखर होकर अपनी बात रखें।

अभिव्यक्ति से पलायन और रहस्यमय चुप्पी किसी चीज का समाधान नहीं है। यथास्थितिवाद के दलदल से बाहर निकलिए और अपने अंदर गांधी जी की तरह सच को सच कहने का साहस पैदा कीजिए। बलिदान दिवस पर पूज्य बापू की जयकार या उत्सवी उन्माद से बढ़ कर यही उनके प्रति हम भारत वासियों की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
’देवेंद्र जोशी, उज्जैन

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