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मुजफ्फरपुर कांड पर चुप्पी

चुनाव प्रचार के दौरान मुजफ्फरपुर में बड़े-बड़े राजनेताओं की सभा हुई, लेकिन इस कांड का जिक्र तक नहीं हुआ। मानो कुछ हुआ ही नहीं या ये सब घटनाएं होती रहेंगी। किसी की अंतरात्मा ने कुछ नहीं बोला, लेकिन बिहार की अंतरात्मा डोल गई।

Author May 20, 2019 5:52 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटो)

बिहार के मुजफ्फरपुर के आश्रय गृह की चौंतीस बच्चियों से दुष्कर्म और ग्यारह बच्चियों की हत्या झकझोर देने वाली घटना है। लेकिन इस घटना से सत्ता पक्ष असहज नहीं हुआ, बल्कि जब तक इस कांड से पर्दा नहीं उठा तब तक इसके आरोपित ब्रजेश ठाकुर पर सरकार मेहरबान रही। उसके अखबार ‘प्रात:कमल’ को करोड़ों रुपए के विज्ञापन मिलते रहे। मुजफ्फरपुर में ठाकुर का आवास सफेदपोशों का अतिथिशाला था। बिहार सरकार की पूर्व समाज कल्याण मंत्री के पति सहित अनेक राजनेताओं के इस कांड में शामिल होने की बात कही सामने आई है।

चुनाव प्रचार के दौरान मुजफ्फरपुर में बड़े-बड़े राजनेताओं की सभा हुई, लेकिन इस कांड का जिक्र तक नहीं हुआ। मानो कुछ हुआ ही नहीं या ये सब घटनाएं होती रहेंगी। किसी की अंतरात्मा ने कुछ नहीं बोला, लेकिन बिहार की अंतरात्मा डोल गई। भले ही कोई सुशासन का दंभ भरे, लेकिन राजसत्ता के चेहरे पर कलंक की टीका लग गया। राजनेताओं पर से विश्वास उठ गया। अगर इस कलंक को धोना है और बिहार की उन बेटियों के कोई न्याय के पक्षधर हैं तो वे न्यायलय को जांच में सहयोग करें। इतने बड़े कांड की जिम्मेवारी लेने को कोई तैयार नहीं है, न सरकार इस पर अपना मुंह खोलती है।
’प्रसिद्ध यादव, बाबूचक, पटना

छवि और विवाद
विश्व प्रसिद्ध पत्रिका ‘टाइम’ ने अपने हालिया संस्करण में ‘इंडियाज डिवाइडर इन चीफ’ शीर्षक से एक आवरण कथा छापी है जिसमे प्रधानमंत्री को भारत का विभाजक बताया गया है। ‘टाइम’ का यह शीर्षक और रिपोर्ट विवादों में घिर गई है। जहां एक ओर भाजपा इसे सिरे से खारिज कर रही है, वहीं अन्य दल इसे आड़े हाथों लेकर प्रधानमंत्री की असलियत बता रहे हैं। सवाल है कि क्या यह तथ्यात्मक रूप से सही है..? इस लेख को लिखने वाले आतिश तासीर ने यह किस आधार पर कहा है? क्या प्रधानमंत्री ने सरकारी योजनाओं का वितरण जातिगत आधार पर किया है या फिर आए दिन सांप्रदायिक दंगे भड़क रहे हैं? क्या एक विशेष समुदाय देश छोड़ कर पलायन कर रहा है या फिर मस्जिदों और चर्चों पर हमले हो रहेहैं?

अगर नहीं तो यह लेख और लेखक किस विभाजन की बात कर रहा है! रही बात कथित गो-रक्षकों की तो सनद रहे प्रधानमंत्री ने अपने मंच से ऐसे फर्जी लोगों को कड़ी हिदायत देते हुए चेताया भी है। सवाल यह है कि क्या ऐसी मशहूर पत्रिका को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के पांच सालों को एक विवादित शीर्षक में कैद करना चाहिए जिसका कोई मजबूत आधार न हो? हाल ही में दो बड़े राष्ट्रों रूस और संयुक्त अरब अमीरात ने प्रधानमंत्री को सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा है। कुछ महीने पहले दक्षिण कोरिया ने ‘सिओल पीस प्राइज’ और संयुक्त राष्ट्र ने ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ सम्मान प्रधानमंत्री को दिया था। तो क्या शांति पुरस्कार अशांति और सर्वोच्च सम्मान बंटवारे के लिए मिलता है..?
’संजय दुबे, नई दिल्ली

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