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चौपाल: त्याग की जरूरत

बूंद बूंद से घड़ा भरने की विराट भावना से ओतप्रोत हो अगर हम सक्रिय हो जाएं तो देश के समक्ष आर्थिक समस्या को बहुत हद तक दूर किया जा सकता है। देश और राज्यों के अन्य संवैधानिक पदों पर विराजमान लोग भी अगले एक वर्ष तक अपने वेतन का तीस प्रतिशत दान करेंगे तो यह सराहनीय कदम होगा।

Author Published on: April 9, 2020 1:44 AM
महाराष्ट्र और तेलंगाना में सरकारी कर्मचारियों को इस महीने कटकर मिलेगी सैलरी

इस वक्त पूरी दुनिया कोरोना की विभीषिका और आर्थिक मंदी से पार पाने में जुटी है, जबकि भारत अपनी विरासत, संचित नैतिक और सामूहिक जनशक्ति के संचार से एक नई पटकथा लिखते हुए नित्य नए घोषित प्रकल्पों से जीवन के हर क्षेत्र को जोड़ने के लिए संकल्पित है। भारत सरकार के शीर्ष पर बैठे महानुभावों के वेतन से तीस प्रतिशत की राशि सरकारी कोष में अगले एक वर्ष तक जमा करने का निर्णय ऐतिहासिक तो है ही, यह एक प्रेरक प्रसंग है, जो दूसरों को भी राष्ट्रीय कल्याण की पगडंडी पर चलने का संदेश देता है। वर्तमान परिस्थिति की करुण पुकार है कि इस समर्पण यज्ञ में यथाशक्ति हर किसी को अपनी भूमिका निभाने के कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

बूंद बूंद से घड़ा भरने की विराट भावना से ओतप्रोत हो अगर हम सक्रिय हो जाएं तो देश के समक्ष आर्थिक समस्या को बहुत हद तक दूर किया जा सकता है। देश और राज्यों के अन्य संवैधानिक पदों पर विराजमान लोग भी अगले एक वर्ष तक अपने वेतन का तीस प्रतिशत दान करेंगे तो यह सराहनीय कदम होगा। अधिकांश उच्च वेतनभोगी लोगों के खर्चे कुछ ऐसे गैर-उत्पादक मदों में होते रहते हैं, जिस पर तत्काल विराम और अंकुश से ही देश की निधि सामर्थ्यवान होकर कोरोनो कहर के संपूर्ण विसर्जन में सक्षम हो सकेगी, जिसकी आज जरूरत है।
’अशोक कुमार, पटना

प्रकृति से खिलवाड़
हमारे देश में इक्कीस दिन की बंदी के दौरान जल, थल और वायु प्रदुषण बेहद कम हुआ। वायु प्रदुषण इतना साफ हुआ कि पंजाब के जालंधर से सैंकड़ों किलोमीटर दूरी पर स्थित हिमाचल के धौलाधार की पहाड़ियां नजर आने लगीं, जोकि प्रदूषण के कारण पहले नजर नहीं आती थीं। देश की नदियों के स्वच्छ होने की खबरें आने लगीं। इंसान हर क्षेत्र में चाहे जितनी मर्जी तरक्की कर ले, लेकिन शुद्ध आबोहवा के बिना वह स्वस्थ रह कर अपना जीवन खुशहाली से नहीं जी सकता। धन दौलत से इंसान महंगा इलाज करवा सकता है, लेकिन पैसे से अच्छा स्वास्थ्य नहीं खरीद सकता। आधुनिकता और भौतिकतावाद की अंधी दौड में इस कदर दौड़ रहा है कि इंसान को अपने वातावरण का भी खयाल नहीं रहा है, वातावरण के प्रति लापरवाही जीव-जंतुओं और अब खुद इंसान की जान पर भी भारी पड़ना शुरू हो चुकी है। अब भी मौका है, बढ़ते प्रदूषण को रोकने के उपाय किए जाएं, प्रकृति को संभालने और बढ़ते प्रदूषण पर सरकारों और आमजन को बिना किसी स्वार्थ के एकजुट होकर प्राथमिक और युद्ध स्तर पर प्रयास करने होंगे। तभी भविष्य में कोरोना जैसे खतरों से बचा जा सकता है, नहीं तो यह न हो कि प्राणी जाति के लिए स्वर्ग जैसी धरती नरक बन जाए।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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