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चौपालः समय का साहित्य

पच्चीस सितंबर के अंक में ‘गंभीर बनाम लोकप्रिय साहित्य’ पर चर्चा के कुछ सार्थक निष्कर्ष निकलें ...

Author September 30, 2016 3:46 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

पच्चीस सितंबर के अंक में ‘गंभीर बनाम लोकप्रिय साहित्य’ पर चर्चा के कुछ सार्थक निष्कर्ष निकलें तो आज के संदर्भ में लेखकों, उनके साहित्य को नई दिशा मिले और वे पाठकों की नब्ज पकड़ कर देश, काल, सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक यथार्थ को युवा पीढ़ी की पसंद की चाशनी में डुबो कर लेखन करें, जो टिकाऊ हो और बिकाऊ भी। लेकिन बहस में शामिल लेखकों ने आज के लोकप्रिय और गंभीर दलित-आदिवासी और स्त्री विमर्श के साहित्य को कोई तवज्जो नहीं दी। क्या इस साहित्य का देशकाल से कोई संबंध नहीं है? क्या ये गंभीर और लोकप्रिय, किसी भी वर्ग में नहीं आते? देवकीनंदन खत्री से लेकर प्रेमचंद, रेणु, श्रीलाल शुक्ल, गुलशन नंदा और वेद प्रकाश शर्मा तक का जिक्र किया गया, पर दलित या आदिवासी लेखकों में एक भी लेखक उद्धरण के लायक नहीं लगा और न उनकी कोई कृति। जबकि आज के संदर्भ में दलित साहित्य और आदिवासी साहित्य किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। स्त्री-विमर्श चुनौती पेश कर रहा है, बहुजन साहित्य की अवधारणा बनने लगी है।

आज हमारे पास संचार के जितने साधन हैं, उतने पहले कभी नहीं थे। सोशल मीडिया में फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, वाट्सऐप आदि लोकप्रिय माध्यम हैं। आज के पाठक के पास फुर्सत के पल कम हैं। उसे थोड़े में ही सब कुछ चाहिए। यानी कुछ रोचक, हास्य, व्यंग्य, रहस्य-रोमांच, ज्ञानवर्धक, आज के समय से सरोकार रखता हुआ, कुछ सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक हालात का साक्षात्कार और कुछ मसालेदार भी। यही कारण है कि हिंदी के युवा पाठक चेतन भगत को पढ़ना चाहते हैं, भले वह उनकी रचनाओं का हिंदी अनुवाद क्यों न हो। दूसरी बात यह है कि हिंदी के आलोचकों ने गंभीरता कुछ ज्यादा ही ओढ़ रखी है। जीवन विभिन्न रंगों और रसों का संगम होता है। लेकिन गंभीर आलोचक उन्हें लुगदी साहित्य कह कर नकार देते हैं। जबकि उनका एक बड़ा पाठक वर्ग होेता है। यों हम जिन्हें कालजयी रचनाएं कहते हैं, वे भी बदलते समय में शत-प्रतिशत प्रासंगिक नहीं रहतीं।
मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आज के सिनेमा ने समय के साथ अपने आपको जितना अद्यतन किया है, साहित्य उसके मुकाबले पीछे रह गया। इसलिए आज का हिंदी सिनेमा साहित्य से कहीं आगे बढ़ गया है। आज साहित्यकारों पर भी फिल्में बनने लगी हैं। इसके अलावा, समसामयिक मुद्दों पर भी फिल्में बन रही हैं और अच्छी कमाई कर रही हैं। निर्देशक नागराज मंजुले के निर्देशन में दलित मुद्दे पर दो करोड़ में बनी फिल्म ‘सैराट’ अस्सी करोड़ की कमाई कर चुकी है। ‘पिंक’ जैसी कितनी ही फिल्में स्त्री विमर्श को हमारे सामने रखती हैं।
व्यावसायिक दुनिया में कहा जाता है- जो दिखता है वह बिकता है। लेकिन आज वैश्वीकरण के दौर में साहित्य ऐसा हो जो हमें समसामयिक वैश्विक समस्याओं, उनके समाधान मनोरंजन की चाशनी में लपेट कर सुझाता हो। रोचक हो, पर वास्तविकता के धरातल पर हो। मनुष्य और मनुष्य के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव और असमानता को नकारता हो। सामाजिक न्याय और बंधुत्व को बढ़ावा देता हो। मानव अधिकारों का समर्थन करता हो, समता और मानवीय गरिमा में विश्वास जगाता हो।
’राज वाल्मीकि, ईस्ट पटेल नगर, नई दिल्ली

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