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चौपाल: बुजुर्गों की सुध

आज की औलादें घर के बुजुर्गों को नजरअंदाज करती हैं। वृद्धावस्था में जब उन्हें सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत होती हैं, तब उनकी औलादें उन्हें वृद्धाआश्रम में या कहीं भी यों ही बेसहारा छोड़ देते हैं।

बुजुर्ग माता-पिता को जिस उम्र में बच्चों का साथ की जरूरत होती है, उस उम्र में उन्हे अकेला छोड़ दिया जाता है।

‘बुजुर्गों का कोना’ (1 अक्तूबर, दुनिया मेरे आगे) में जो विचार व्यक्त किए गए हैं, वे हमारे बुजुर्ग अभिभावकों की सुध लेते हैं।? हमारे माता-पिता हमारी जिम्मेदारी हैं। आजकल यह चलन चल पड़ा है कि जब माता-पिता बुजुर्ग हो जाते हैं तो उनके बच्चों द्वारा उन्हें बेघर कर दिया जाता है या उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया जाता है।

कुछ समय पहले एक अदालत ने आदेश दिया था कि बूढ़े माता-पिता की जिम्मेदारी उठाना लड़का-लड़की, दोनों का दायित्व है। इसके बावजूद आज की औलादें घर के बुजुर्गों को नजरअंदाज करती हैं। वृद्धावस्था में जब उन्हें सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत होती हैं, तब उनकी औलादें उन्हें वृद्धाआश्रम में या कहीं भी यों ही बेसहारा छोड़ देते हैं। ऐसी औलाद माता-पिता की संपत्ति पर तो अपना अधिकार जताती है, लेकिन उनके प्रति अपना फर्ज भूल जाती है। साथ रख कर उनका खयाल रखने के दायित्व बहुत कम लोग निभा पाते हैं।

सरकार की पहल पर बैंकों ने ‘खिर्स मॉर्गेज’ का प्रावधान शुरू किया है। सरकार को ऐसी ही और पहल करनी चाहिए, जिससे हमारे देश मे वृद्धाश्रम जैसी जगह नहीं हो।
’निर्जला पोरवाल, आलोट, मप्र

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