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चौपालः बदलाव की सीख

सोनम वांगचुक स्थानीय छात्रों के एक समूह द्वारा 1988 में स्थापित स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (एसईसीओएमएल) के संस्थापक-निदेशक भी हैं।

Author August 13, 2018 5:04 AM
सोनम वांगचुक

वर्ष 2018 के रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित 1966 में जन्मे लद्दाखी अभियंता, आविष्कारक और शिक्षा सुधारवादी सोनम वांगचुक के जीवन से हमें सीख मिलती है कि अपने क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं का निराकरण जितने बेहतर ढंग से उस क्षेत्र में रहने वाला इंसान कर सकता है, उतना कोई बाहरी इंसान नहीं कर सकता। सभी दुर्गम और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को यह सोच अपनानी होगी। ‘लांग लांग एगो, दियर लिव्ड अ वुडकटर इन अ स्माल विलेज’ कहानी रटाने के बजाय ऐसे क्षेत्रों की स्कूली शिक्षा में उन बदलावों की जरूरत है जो वहां के छात्रों को पलायन से रोकने में मदद करें। अपनी सूझबूझ से इंसान कई बार ऐसी उपलब्धियां अर्जित कर लेता है जिनसे लाखों लोगों की जिंदगी बदल जाती है।

सोनम वांगचुक स्थानीय छात्रों के एक समूह द्वारा 1988 में स्थापित स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (एसईसीओएमएल) के संस्थापक-निदेशक भी हैं। संस्थापक छात्रों के अनुसार वे एक ऐसी विदेशी शिक्षा प्रणाली के पीड़ित हैं जिसे लद्दाख पर थोपा गया है। सोनम को एसईसीएमओएल परिसर डिजाइन करने के लिए भी जाना जाता है जो पूरी तरह सौर-ऊर्जा पर चलता है और खाना पकाने, प्रकाश या तापन (हीटिंग) के लिए जीवाश्म र्इंधन का उपयोग नहीं करता है। उन्हें सरकारी स्कूल व्यवस्था में सुधार लाने के लिए सरकार, ग्रामीण समुदायों और नागरिक समाज के सहयोग से 1994 में ‘ऑपरेशन न्यू होप’ शुरू करने का श्रेय भी प्राप्त है।

सोनम ने बर्फ-स्तूप तकनीक का आविष्कार किया है जो कृत्रिम हिमनदों (ग्लेशियरों) का निर्माण करती है। शंकु आकार के ऐसे बर्फ के स्तूपों को सर्दियों का पानी संचित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने स्थानीय जरूरतों के अनुसार ऐसे शौचालयों का निर्माण किया है जिनमें पानी का उपयोग जरूरी नहीं। इन शौचालयों से वर्ष बाद जो खाद प्राप्त होती है, उसका स्थानीय किसान खेती में इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने पानी के ऐसे टैंक भी बनाए हैं जिनमें शून्य से चालीस-पैंतालीस डिग्री सेल्सियस कम तापमान पर भी विशेष व्यवस्था की वजह से पानी बर्फ में तब्दील नहीं होता है। वांगचुक से हमारे देश के युवाओं और विशेषकर वैज्ञानिकों को सीख लेनी चाहिए। हमारी फौज भी उनके विचारों से लाभान्वित हो सकती है।

सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

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