प्रदूषण की तहें

‘प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन का प्रश्न’ (लेख, 3 सितंबर) पढ़ा। स्वच्छता का लक्ष्य और स्वच्छ भारत का सपना तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक प्लास्टिक का प्रयोग शत-प्रतिशत बंद नहीं होता।

सांकेतिक फोटो।

‘प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन का प्रश्न’ (लेख, 3 सितंबर) पढ़ा। स्वच्छता का लक्ष्य और स्वच्छ भारत का सपना तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक प्लास्टिक का प्रयोग शत-प्रतिशत बंद नहीं होता। हमारे देश में प्लास्टिक कचरा भी बढ़ता जा रहा है, कूड़े के ढेर में सबसे ज्यादा पॉलीथिन बैग ही नजर आते हैं। इस कचरे को जला कर भी नष्ट नहीं किया जा सकता। इसे जलाने से जहरीली गैसें निकलती हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार देश में सबसे ज्यादा प्लास्टिक कचरा बोतलों का होता है। देश के नागरिक और विदेशी लोग भी जब किसी कारण हमारे देश आते हैं तो ये सब पानी की प्लास्टिक की बोतलों को इधर-उधर फेंक कर प्लास्टिक कचरे को बढ़ाते हैं।

इस हकीकत बावजूद प्लास्टिक का दिन-प्रतिदिन बढ़ता प्रयोग लोगों की सेहत पर तो भारी पड़ ही रहा है, साथ ही प्रकृति को दूषित करने और भूमि की उत्पादन क्षमता को भी कम कर रहा और इसके साथ पशुओं द्वारा इसको खाना इनकी जान पर भी भारी पड़ सकता। यह एक तथ्य है कि पॉलीथीन के बैग बारिश के पानी को धरती में नीचे जाने से रोकता है, क्योंकि जब कुड़ा-कर्कट के साथ ये धरती की सतह पर दब जाते हैं तो उससे पानी को जमीन के अंदर नहीं जाने का रास्ता मिलता।

कुछ लोग प्लास्टिक को कुड़े-कर्कट के साथ जलाते हैं, लेकिन शायद वे यह नहीं जानते कि इससे जो जहरीला धुंआ निकलेगा, वह जानलेवा बीमारियों को भी जन्म देता है। अगर लोग फल-सब्जियों के छिलकों या इनके अन्य अवशेषों और बचे शाकाहारी भोजन को गौशाला में, प्लास्टिक के कचरे, अखबारों या अन्य कागज की रद्दी को कबाड़ी को देना आरंभ कर दें तो यह प्रयास भी देश को कचरे की आजादी से दिलाने में मुख्य भूमिका निभा सकता है।

हिमाचल प्रदेश में जो पर्यटक बाहरी राज्यों से प्रदेश की खूबसूरती का नजारा लेने आते हैं, उनमें से कुछ पानी और अन्य पेय पदार्थों की बोतलों को इधर उधर फेंक कर प्रदेश की सुंदरता को ग्रहण लगा देते हैं। इसके लिए सरकार को कुछ ऐसे प्रावधान करने चाहिए कि प्रदेश में आने वाले पर्यटक प्रदेश की सुंदरता को ग्रहण न लगा पाएं।
’राजेश कुमार चौहान, जलंधर, पंजाब

साथी खेल

एक कहावत है- ‘पढ़ोगे लिखोगे तो होगे नवाब, जो खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब’। लेकिन इस कहावत को पैरा ओलंपिक में भाग लेने और कामयाबी हासिल करने वाले कई खिलाड़ियों के साथ गलत साबित कर दिया। जन्म से शरीर के किसी हिस्से में दिक्कत होने के बावजूद पैरोलंपिक में पदक जीतना दृढ़ आत्मविश्वास और लगन की कहानी कहता है। आज भी हमारे देश में बच्चों को खेल के लिए उतना प्रोत्साहित नहीं किया जाता, जितना पढ़ाई के लिए किया जाता है। तोक्यो पैराओलंपिक और संपन्न हुए ओलंपिक खेलों ने यह दिखाया कि पढ़ाई के साथ हमारे जीवन मे खेल का होना कितना जरूरी है।

खेल हमारे शारीरिक और मानसिक विकास में सहयोगी हैं और साथ ही हमें अनुशासन और नैतिकता सिखाने में भी खेलों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। रजत पदक विजेता सुहास यतिराज ने दिखाया कि कैसे खेल और पढ़ाई, दोनों हमारे जीवन में अपना अलग स्थान रखते हैं। आज के समय में जहां बच्चे आॅनलाइन गेम खेलने में व्यस्त रहते हैं, ऐसे में जरूरी है कि माता-पिता अपने बच्चों को आॅनलाइन गेम के बजाय हमारे रोजमर्रा की जिंदगी में घुले खेलकूद में सक्रिय होने के लिए प्रेरित करें, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक विकास में सहायता मिले।
’अभिषेक जायसवाल, सतना, मप्र

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