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चौपाल: बाजार में किसानी

देश में हर किसी को सरकार के किसी भी फैसले से सहमति नहीं होने पर विरोध करने का कानूनी अधिकार है। अगर इस तरह लाठीचार्ज करके जनता के अधिकारों को दबाया जाता है तो देश के लोकतांत्रिक स्वरूप पर सवाल उठेंगे कि क्या यहां लोकतंत्र बचा है या नहीं।

Author Updated: September 16, 2020 5:12 AM
farmer, agricultureकोरोना काल में किसानों ने ही देश की अर्थव्यवस्था को संभाला।

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा कृषि से संबंधित जारी तीन अध्यादेशों का किसानों और आढ़तियों द्वारा विरोध किया जा रहा है। दरअसल, केंद्र सरकार की ओर से इन अध्यादेशों को जारी करने से पहले किसान संगठनों से कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया था। किसानों का आरोप है कि सरकार ने बड़े व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए एकतरफा फैसला लिया है। इसी को लेकर पिछले दिनों हरियाणा में कुरुक्षेत्र जिले के पीपली में किसानों द्वारा अध्यादेश के विरोध में आंदोलन किया गया, जहां पुलिस द्वारा लाठीचार्ज भी किया गया। बहुत सारे किसानों को काफी चोट आई। लाठीचार्ज को लेकर सरकार भी किरकिरी हुई। विपक्ष ने सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए किसान विरोधी भी कहा है।

देश में हर किसी को सरकार के किसी भी फैसले से सहमति नहीं होने पर विरोध करने का कानूनी अधिकार है। अगर इस तरह लाठीचार्ज करके जनता के अधिकारों को दबाया जाता है तो देश के लोकतांत्रिक स्वरूप पर सवाल उठेंगे कि क्या यहां लोकतंत्र बचा है या नहीं। पुलिस के पास लाठीचार्ज के अलावा भी बहुत सारे विकल्प थे, जैसे किसानों की बात को सुना जाता, किसान संगठन के नेताओं से बात की जाती तो मामले को सुलझाया जा सकता था। लेकिन जो पुलिस की तरफ से जो कार्रवाई की गई, निश्चित तौर पर उसे सही नहीं कहा जा सकता।

अगर बात अध्यादेश की करें तो पहले अध्यादेश में सरकार ने फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त करने और किसानों की फसलें मंडी के बजाय उनके खेतों से ही खरीद करने की बाते कही गई हैं। जबकि किसानों का कहना है कि एमएसपी खत्म करने से हमारी फसलों के खरीदने पर निजी कंपनियां अपनी मर्जी से मूल्य तय करेंगी जो हमारे लिए घाटे का सौदा होगा, क्योंकि सरकार सीधे तौर पर हमारी फसलें खरीदने से बच रही है।

गौरतलब है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार किसानों से फसलें खरीदने की जिम्मेवारी लेती है। यह मूल्य साल में दो बार तय किया जाता है। दूसरे अध्यादेश में सरकार ने आलू, प्याज, दलहन, तिलहन, तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया है, जिस पर किसानों का कहना है कि इससे बिचौलियों को फायदा होगा, क्योंकि छोटे किसानों के पास भंडारण की सुविधा नहीं होती। वह भी निजी कंपनियां करेंगी, जिसका नुकसान किसानों को ही होगा। तीसरे अध्यादेश में सरकार ने व्यवस्था की है कि किसानो को वही फसल की बिजाई करनी हैं जो निजी कंपनियां कहेंगी। इसका किसानों को उचित मूल्य भी मिलेगा। लेकिन किसानों का कहना है कि अगर बाजार में मूल्य कम-ज्यादा होता है तो वे कंपनिया भी किसानों से कम कीमत पर ही खरीद करेंगी। जबकि किसानों का खर्चा पहले से ही ज्यादा आया होगा।

देखा जाए तो किसानो की मांगें जायज हैं, क्योंकि खेती को अब घाटे का सौदा कहते हुए नई पीढ़ी किनारा करने लगी है। वैसे पूर्णबंदी में पूरे देश ने देखा कि किस तरह देश के अन्नदाताओं ने खाद्यान्न की कोई कमी नहीं आने दी। आज जहां जीडीपी औंधे मुंह गिरी हुई है, देश की अर्थवयवस्था की थोड़ी-बहुत लाज खेती ने ही बचा रखी है। लेकिन चिंता की बात यह है सरकार ने कृषि और किसानों को महज कुछ लोगों के मुनाफे का जरिया बनाने की ओर कदम बढ़ा दिया है।

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