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चौपाल: बदलाव का वक्त

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए भी यह एक अवसर है। केंद्र व राज्य सरकारों को ग्रामीण इलाकों में लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति के साथ ही बड़े उद्योगों को भी वहां लगाने पर विचार करना होगा।

देशभर में प्रवासी मजदूरों का अपने घर लौटना जारी है। (एक्सप्रेस फोटो)

पूर्णबंदी की घोषणा के बाद से ही बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों का पलायन जारी है। वास्तव में यह ऐसा समय है जब मजदूरों और विकास की एक वैकल्पिक नीति के बारे में सोचा जाना चाहिए। प्रवासी मजदूर हमेशा से ही उपेक्षा के शिकार रहे हैं। अपने घरों से दूर अन्य राज्यों में काम करने वाले ये मजदूर न सिर्फ उन शहरों की आय में सहयोग करते हैं, बल्कि कुछ अपने घरों को भी भेजते हैं। फिलहाल प्रवासी मजदूरों की वापसी ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक अवसर की तरह है।

गांवों मे अगर उन्हें रोजगार मिल जाए तो शायद वे वापस शहर नहीं लौटेंगे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए भी यह एक अवसर है। केंद्र व राज्य सरकारों को ग्रामीण इलाकों में लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति के साथ ही बड़े उद्योगों को भी वहां लगाने पर विचार करना होगा। भारत के पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों को अर्थव्यवस्था और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का यही सही समय है। हालांकि प्रवासी मजदूरों की वापसी से उन शहरों मे उत्पादन पर बुरा असर पड़ेगा, जहां से ये लौट आए हैं। जब पूर्णबंदी खुलेगी तो रोजगार के कारण मजदूर वापस उन शहरों की ओर तत्काल तो पलायन नहीं करेंगे नहीं।
’अमन प्रताप सिंह, सिद्धार्थनगर (उप्र)

विचारों का टीका

शहर हो या गांव, भारत की जनता सभी जगह संघर्ष कर रही है। अडिग हौसले को शक्ति बना भविष्य के खतरों को भांपते हुए नई राहों में चल रही है। कोरोना को हम मानवता के लिए खतरा समझ जड़ से मिटाने में लगे हुए हैं, यह अच्छी बात है। पर इससे भी बेहतर तब होगा जब हम मानवता के असली खलनायक को समझें और उसे स्थायी रूप से मिटा सकें।

मानवता के असली खलनायक तो समाज में मौजूद हैं। सांप्रदायिक दंगे, हत्याएं, लूटमार, धोखाधड़ी, हिंसा, आतंकवाद और समाज में व्याप्त जातिवाद, अंधविश्वास जैसी बुराइयां हमें शर्मसार करती हैं। लोगों को शिक्षित करने, उन्हें जागरूक करने के लिए विचारों का टीका देने की जरूरत है। इसके लिए तो हमें दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। यह टीका भारत के स्वर्णिम इतिहास के उच्च मानवीय मूल्यों के माध्यम से बनेगा, तब जाकर भारतवर्ष सफल होगा।
’सुनील चिलवाल, हल्द्वानी (उत्तराखंड)

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