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न्याय की भाषा

हिंदी आज अपने घर में ही कैद है लेकिन उच्च न्यायालय के वर्तमान निर्णय से हिंदी प्रेमियों के हृदय में आशा और उत्साह का सूर्योदय हुआ दिखता है।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

पटना उच्च न्यायालय ने हिंदी में याचिकाएं स्वीकार करने संबंधी निर्णय देकर एक ऐतिहासिक कार्य तो किया ही है साथ ही वर्षों से चल रहे संघर्ष का सम्मान भी किया है। हालांकि 1972 में ही राज्य सरकार ने हिंदी के उपयोग संबंधी अधिसूचना जारी कर राज्य में प्रचलित इस भाषा को उच्च न्यायालय में भी कतिपय मामलों में लागू करने का निर्देश जारी किया था लेकिन लालफीताशाही और प्रक्रियाओं की उलझनों ने इसके कार्यान्वयन को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। उच्च न्यायालय के अभिलेख साक्षी हैं कि करीब दो दशक पूर्व न्यायाधीश सतीश चंद्र मिश्र ने हिंदी में न्यायिक निर्णय सुना कर इस भाषा के प्रति श्रेष्ठ प्रतिमान स्थापित किया था। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि पटना उच्च न्यायालय में प्रारंभ से हिंदी के जानकार न्यायाधीश पदस्थापित रहे हैं मगर अज्ञात कारणों ने उन्हें हिंदी में अपना फैसला देने से वंचित रखा गया है। खैर, जो बीत गई सो बात गई, अब न्यायालय के अन्य कार्य भी हिंदी में संपन्न किए जाएं इसकी सामयिक जरूरत है।

बिहार ही नहीं बल्कि अन्य सभी हिंदी भाषी राज्यों के न्यायालयों में भी हिंदी में सभी कार्य संपन्न हों इसके लिए भारत सरकार के राजभाषा विभाग की सक्रियता आवश्यक है। हिंदी आज अपने घर में ही कैद है लेकिन उच्च न्यायालय के वर्तमान निर्णय से हिंदी प्रेमियों के हृदय में आशा और उत्साह का सूर्योदय हुआ दिखता है। मॉरीशस की यात्रा के दौरान पोर्टलुई हवाई अड्डे पर अंग्रेजी के साथ-साथ संकेत पट्टिकाएं हिंदी में भी लिखी हुई थीं जबकि अपने देश के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर इसकी कमी दिखती है। गुड-मॉर्निंग से लेकर गुड नाइट तक के दैनिक अंग्रेजी के व्यवहार ने हमारे दिमाग को ‘स्मार्ट’ तो बना दिया है लेकिन हृदय-तल में विराजमान हिंदी के स्वर को कुंठित मुद्रा में ला दिया है।

आंकड़े गवाह हैं कि आज कई देशों में हिंदी की पढ़ाई, शोध, कार्यशाला नियमित रूप से संचालित हैं। अपने देश का जब 70 प्रतिशत भूभाग हिंदी भाषा से आच्छादित तो इसे मुख्यधारा का अंग बनाने के संकल्प से सभी हिंदी प्रेमियों को जुटना अनिवार्य लगता है। उच्चतम न्यायालय में भी हिंदी प्रयोग की प्रतिष्ठा मूर्त रूप ले इस ओर भी चेष्टारत होना जरूरी है और सरकारी सहयोग भी।
’अशोक कुमार, पटना

कार्रवाई का दायरा
चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने पर मुख्यमंत्री/ पूर्व मुख्यमंत्री सहित अनेक राजनीतिक दलों के नेताओं पर कार्रवाई कर उनके तुनाव प्रचार करने पर 24 से 72 घंटे की पाबंदी लगाई जो स्वागतयोग्य है। वैसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया द्वारा भी किया जा रहा है। सभी दलों के बड़े नेताओं के वक्तव्यों को दलों के कुशल प्रबंधन के आधार पर अनेक बार दिखाया जा रहा है या सीधा प्रसारण किया जाता है। बहुधा होता यह है कि नेताओं के भाषण में से सिर्फ उन्हीं बिंदुओं का प्रमुखता से प्रकाशन/ प्रसारण किया जा रहा है जिससे वैमनस्य/ विवाद फैले। कुल मिलाकर नकारात्मक बातें परोसी जा रही हैं। सिर्फ राजनीतिक दलों या उनके नेताओं पर कार्रवाई से साफ-सुथरे चुनाव नहीं होंगे, इसके लिए चुनाव आयोग को अपनी जद में सबको लेना होगा।
’मिलिंद रोंघे, महर्षिनगर, इटारसी

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