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चौपालः बुनियाद की भाषा

किसी भी देश की राष्ट्रभाषा को सुनते ही हमारे मन-मस्तिष्क में धर्म से लबरेज काल्पनिक चेहरा उमड़ने लगता है। उदाहरण के तौर पर उर्दू, अरबी, फारसी का मुसलिम, हिंदी का हिंदू, अंग्रेजी का ईसाई और पंजाबी का सिख धर्म के रूप में प्रतिबिंब उजागर होता है।

Author August 27, 2018 5:01 AM
शायद पाकिस्तानी शासक यह भूल चुके हैं कि इंसानियत की राह पर चलने वाला देश लोगों के दिलों में और देश की मिट्टी उनके खून में समाहित होती है, जिसे न तो कोई राष्ट्रभाषा और न ही मातृभाषा अलग कर सकती है।

किसी भी देश की राष्ट्रभाषा को सुनते ही हमारे मन-मस्तिष्क में धर्म से लबरेज काल्पनिक चेहरा उमड़ने लगता है। उदाहरण के तौर पर उर्दू, अरबी, फारसी का मुसलिम, हिंदी का हिंदू, अंग्रेजी का ईसाई और पंजाबी का सिख धर्म के रूप में प्रतिबिंब उजागर होता है। इसी सोच को साकार करने को आतुर पाकिस्तान शिक्षा से लेकर राज-काज तक की भाषा के रूप में उर्दू इस्तेमाल करता आ रहा है। इसका एक बड़ा कारण और है कि जो स्थिति भाषा और धार्मिक विविधता के आधार पर भारत में झेलनी पड़ी, उससे पाकिस्तान को वे बचाने की कोशिश करते हैं।

सबसे पहले अंग्रेजों ने भाषा के आधार पर भारत में विभाजन की नींव रखी, इसके बाद भारत से पाक विभाजन हुआ और भाषाई आधार पर भारतीय राज्यों का पुनर्गठन हुआ। इतना ही नहीं भाषा और धर्म के आधार पर ही भारत को तमिलनाडु, पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे प्रांतों से अलगाव की आग उठती दिखाई दे रही है। शायद इसी का संज्ञान लेकर पाकिस्तान उर्दू को अरबी, फारसी के जुगाड़ से भी अपने देश की अवाम के दिलों में डालने की हर संभव कोशिश कर रहा है। जबकि पाकिस्तान में मातृभाषा बोलने वालों का आंकड़ा उर्दू के पूरक है। लेकिन उसे मालूम है कि मातृभाषा को बढ़ावा देने से पाकिस्तान विकेंद्रीकरण का शिकार हो सकता है।

शायद पाकिस्तानी शासक यह भूल चुके हैं कि इंसानियत की राह पर चलने वाला देश लोगों के दिलों में और देश की मिट्टी उनके खून में समाहित होती है, जिसे न तो कोई राष्ट्रभाषा और न ही मातृभाषा अलग कर सकती है। अगर ऐसा होता तो भारत आज अनेकता में एकता की मिसाल पेश नहीं कर रहा होता। आज पाकिस्तान में विकास की लहर तभी दौड़ सकती है जब पाकिस्तानी शासक इस पर विचार करें कि जब आज के युग के शासक ही उर्दू ठीक से नहीं बोल पा रहे तो मातृभाषा को आत्मसात करने वाले प्रांतीय पाकिस्तानी अवाम को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता होगा। वैसे भी मातृभाषा में दिया गया ज्ञान हमारे दिल से होता हुआ दिमाग तक पहुंचता है, जिसे कोई भी जीवनपर्यंत नहीं भुला पाता है।

पिंटू सक्सेना, दिल्ली

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