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दिनदहाड़े चीरहरण

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में नामांकन कराने जा रही बीडीसी महिला के साथ बदसलूकी भरा व्यवहार किया गया।

पंचायत चुनाव में भागलेते मतदाता। फाइल फोटो।

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में नामांकन कराने जा रही बीडीसी महिला के साथ बदसलूकी भरा व्यवहार किया गया। महाभारत की तरह चीरहरण करते हुए उसकी साड़ी खोल दी गई। यह बेहद ही शर्मनाक घटना है। ऐसी घटना को अंजाम देने वालों के पीछे वही चेहरे हैं जो मंच से महिला सुरक्षा की लंबी-लंबी बातें करते हैं। आज राजनीति में अपराधियों का दबदबा किस हद तक बढ़ गया है, यह इस घटना से साफ हो जाता है। इससे तो लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में अब कानून के शासन की जगह जंगलराज स्थापित हो गया है। यह हाल तो पंचायत चुनाव में है। इससे यह भी पता चलता है कि सत्ता हथियाने के लिए हमारे नेता किस हद तक जा सकते हैं। क्या इसी तरह से राजनीति मे महिला सहभागिता बढ़ेगी?

एक महिला शिक्षित होते हुए भी घर की चार दिवारी लांघने से पहले सौ बार सोचती है। जहां राजनीति मे रावण और दुर्योधन साथ हैं वहां महिला सम्मान बेमानी ही होगी। बात दलित पिछड़ी महिलाओं की शिक्षा की हो या संसद में महिलाओं को आरक्षण देने की, दोनों जब तक पूर्ण नहीं होते, तब तक महिलाएं राजनीति में पुरुषो के कंधे से कंधे मिला कर राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में बढ़-चढ़ कर हिस्सा नही ले पाएंगी। एक महिला के साथ हिंसा को केवल हिंसा के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि राजनीतिक चश्में से उसे सही ठहराने की कोशिश करनी चाहिए। देश विकास के शिखर पर तभी पहुंच सकता है जब महिलाओं के साथ दुर्व्यव्हार की दिन-प्रतिदिन बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगेगा। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक शासन व्यवस्था पर सवाल उठता रहेगा।
’किरन मौर्या, इलाहाबाद विवि

तीसरी लहर को न्योता

पहाड़ों पर पर्यटकों की बढ़ती भीड़ ने फिर से चिंता में डाल दिया है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्यटन स्थलों की जो तस्वीरें पिछले दिनों सोशल मीडिया पर आई हैं, उससे तो यह लगता है कि हम पूरी तैयारी कर रहे हैं तीसरे लहर लाने की। घूमने को इस देश में किसने रोका है? पर यह जानते हुए भी कि कोरोना अभी खत्म नहीं हुआ है, हम मास्क उतार कर खुलेआम सुरक्षित दूरी तोड़ कर घूम रहे हैं। चाहे कितने भी तर्क दिए जाएं, पर इस सच को नहीं झुठलाया जा सकता कि इस तरह की लापरवाही सब पर भारी पड़ सकती है। हमें एक जिम्मेदार नागरिक की भांति सोचना चाहिए कि दुनिया के दूसरे सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश जिसकी स्वास्थ्य व्यवस्था दूसरी लहर के कहर में पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी, उससे भी हम कोई सबक क्यों नहीं ले रहे। हम फिर से वही गलतियां दोहरा रहे हैं जिनके कारण दूसरी लहर आई थी।

बेशक पहाड़ों पर पर्यटकों की बढ़ती भीड़ ने वहां के स्थानीय लोगों की आजीविका को पटरी पर ला दिया है, पर अगर यह सैर-सपाटा, मौज मस्ती थोड़े नियमों में बंध कर करें तो कितना अच्छा हो। हालात ऐसे हैं कि स्वास्थ्य मंत्रालय को चेतावनी जारी करना पड़ रही है। दूसरी लहर का ठीकरा हमने चुनावी रैलियों पर फोड़ा था। पर अभी तो कोई रैली नहीं है और न कोई चुनाव, फिर भी कुछ जगहों पर इस प्रकार से सुरक्षित दूरी के नियम की खुलेआम धज्जियां उड़ाने को कौन उचित कहेगा? पर कुछ लोगों ने तो ‘प्राण जाए पर सैर सपाटा ना जाए’ को अपना सिद्धांत बना लिया है। इस देश की विडंबना देखिए कि जहां अप्रैल में इस देश में खोजने पर अस्पताल नहीं मिल रहा था, उसी देश में जुलाई में होटल में नहीं मिल रहे हैं। इस प्रकार की लापरवाही देख कर देश के लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है। लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि अभी घूम लेते हैं, बाद में सरकार को गाली देंगे।
’देवानंद राय, दिल्ली

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