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चौपाल: पलायन का संकट

सामान्य बुद्धि से भी सोचा जाए तो सत्य यह है कि यदि गांव-देहात और कस्बों में बसने वाले भारत को बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा और जीवनयापन के अवसर उन्हीं के क्षेत्रों में उपलब्ध करा दिए जाएं, तो क्यों कोई अपनी जड़ों और अपनों को छोड़कर कही दूर जाना चाहेगा? समय आ गया है, कि सरकारें दिखावा और राजनीति छोड़ कर ईमानदारी से इस पर विचार करें।

Author Published on: April 30, 2020 1:31 AM
स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने से शहरों की ओर पलायन रुकेगा।

गांव-देहात से शहर और शहरों से महानगरों में होने वाले पलायन को अधिकांश राज्य सरकारें संवेदनहीनता दिखाते हुए नजरंदाज करती रही हैं। कुछेक राज्यों द्वारा तो परोक्ष रूप से इसे प्रोत्साहित भी किया जाता रहा। लेकिन कारोना संकट के हालात में अचानक इन्हीं राज्यों द्वारा अपने प्रवासी मजदूरों व कामगारों के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन अचंभित करने वाला है। भारत आज भी एक कृषि प्रधान देश है, परन्तु सरकारों द्वारा नीतियां व योजनाएं बनाते समय कृषक वर्ग की लगातार उपेक्षा किए जाने का ही परिणाम है कि गांव से शहर और शहर से महानगरों को पलायन होना वर्षों से जारी है।

आज की परिस्थितियों में करोड़ों की संख्या में ऐसे प्रवासियों को वापस उनके गांव घरों में पहुचां पाना शासन प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है और प्रवासियों में असंतोष भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे में इस संकट से उबरने के बाद सरकारों को एक सबक यह भी लेना पड़ेगा कि इस तरह के पलायन को रोकने हेतु क्या कदम उठाए जाने चाहिए। सामान्य बुद्धि से भी सोचा जाए तो सत्य यह है कि यदि गांव-देहात और कस्बों में बसने वाले भारत को बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा और जीवनयापन के अवसर उन्हीं के क्षेत्रों में उपलब्ध करा दिए जाएं, तो क्यों कोई अपनी जड़ों और अपनों को छोड़कर कही दूर जाना चाहेगा? समय आ गया है, कि सरकारें दिखावा और राजनीति छोड़ कर ईमानदारी से इस पर विचार करें।
’आदित्य अवस्थी, दिल्ली

अफवाहों का जरिया
सोशल मीडिया आम आदमी की आवाज को बुलंद करने और विचारों को लोगों के सामने रखने का सशक्त माध्यम है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि सोशल मीडिया अफवाहों का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान की घटनाओं को देख कर लगता है कि दंगाई मानसिकता के लोग सोशल मीडिया को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। लोगों को सोशल मीडिया के जरिये भड़काया जाता है और मानसिकता में जहर भर कर अपने अनुसार इस्तेमाल करते हैं।

सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों को रोकने के लिए सोशल साइट कंपनियों ने भी कदम उठाए हैं, लेकिन उनका असर दिख नही रहा है, क्योंकि किसी ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि सच जब जूते पहन रहा होता है तो झूठ सोशल मीडिया से आधी दुनिया घूम चुका होता है। यानि कि अफवाह का वक्त रहते-रहते खंडन करना बेहद जरूरी है। इसके शिकार न केवल आम लोग बल्कि कई राजनेता, गायक, खिलाड़ी भी हो रहे हैं। यही कारण है कि कई बार तो बिना तथ्यों को जांचे जनता के लिए साझा भी कर देते हैं। जनता सच मानने लगती है। सरकार को भी झूठी खबरों पर रोक लगाने के लिए बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।
’महेश कुमार, सिद्धमुख (राजस्थान)

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