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चौपालः किसका हित

श्रम सुधार से भी नियोक्ताओं को फायदा। कृषि सुधारों से भी बड़े धनपतियों बड़ी कंपनियों को ही फायदा।

अब जब प्याज के दाम सौ रुपए किलो तक जाएंगे तो स्थानीय अधिकारी सेठों के गोदामों में छापामारी नहीं कर सकेंगे।

हाल के तीनों कृषि विधेयक संसद से पारित हो गए। इसके तहत कई खाद्यान, फल और सब्जियों का आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा दिया गया है। मतलब अब इसकी जमाखोरी को लाइसेंस प्रदान कर दिया गया है। अब जब प्याज के दाम सौ रुपए किलो तक जाएंगे तो स्थानीय अधिकारी सेठों के गोदामों में छापामारी नहीं कर सकेंगे। सभी जानते हैं कि इन वस्तुओं के कीमतों पर मांग और आपूर्ति से असर पड़ता है। आपूर्ति कम होगी तो मांग बढ़ेगी। मांग बढ़ेगी तो कीमतें बढ़ेंगी। मतलब बिना नैसर्गिक कारणों से भी मूल्य वृद्धि, जमाखोरी करके की जा सकती है। श्रम सुधार से भी नियोक्ताओं को फायदा। कृषि सुधारों से भी बड़े धनपतियों बड़ी कंपनियों को ही फायदा। आम जनता के भले का नाम पर यह सब किया जा रहा है। लेकिन सवाल है कि इस सबसे आखिर किसका भला सुनिश्चित किया जा रहा है!
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड

युवा का भविष्य
शिक्षा व्यक्ति के विकास में सर्वाधिक योगदान देती है। यह बात समूचा विश्व सहजता से स्वीकार करता आया है, लेकिन ऐसा लगता है कि भारत में सरकारें ऐसा नहीं मानतीं। इसका प्रबल उदाहरण सरकारों द्वारा विद्यार्थियों के भविष्य के साथ निरंतर खिलवाड़ करते रहना है। एक विद्यार्थी जब किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है तो न जाने वह कितना संघर्ष झेलता है, लेकिन जब वह परीक्षा अच्छे से संपन्न करके वापस लौटता है तो दो या तीन दिन में ही उसकी आशाओं में पानी फिर जाता है। उत्तर कुंजी इतने गैर-जिम्मेदाराना तरीके से दी जाती है, जैसे उत्तर के लिए कोई सटीक प्रक्रिया अपनाई ही नहीं गई। एक नया संघर्ष तब आता है, जब किसी वजह से मामला न्यायालय में चला जाता है। तब वही संघर्ष और लंबा खिंच जाता है। अब भारत में सरकारी नौकरी नहीं है तो आपके शिक्षा अर्जन का कोई महत्त्व नहीं। भारत में सामाजिक धारणा ऐसी ही है। लोगों के पास मजबूरी भी है। सबके पास स्वरोजगार की सुविधा नहीं है या निजी क्षेत्र में मौके नहीं हैं। इसलिए सरकारों को चाहिए कि विद्यार्थियों के भविष्य के साथ नहीं खेले। हम भारत को तभी एक सशक्त राष्ट्र बना पाएंगे जब यहां का युवा रोजगार और आय की चिंता से दूर रहेगा। वरना ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ मात्र एक कल्पना बन कर रह जाएगा।
’उदय प्रकाश सोनी, उन्नाव, उप्र

कानून के समांतर
आए दिन देश के किसी न किसी कोने से खाप पंचायतों के तुगलकी फरमान के फलस्वरूप अमानवीय और संवेदनहीन खबरें पढ़ने को मिलती हैं। इक्का-दुक्का नजीर पेश करने वाले फैसलों को छोड़ दें तो कई तुगलकी फरमान इतने पक्षपाती, अमानवीय और क्रूर होते हैं कि कई बार रोंगटे खड़े कर देते हैं। केंद्र और राज्यों की सरकारों को ऐसे फरमान सुनाने वाली पंचायतों के खिलाफ कार्रवाई करना चाहिए।
’हेमा हरि उपाध्याय अक्षत, उज्जैन, मप्र

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