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लापरवाही की आग

सरकारें मुआवजे की घोषणा करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाती हैं। हर बार ऐसी घटनाएं होती हैं, जांच समिति या आयोग गठित होते हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: April 13, 2016 1:50 AM
सौ साल पुराने मंदिर में रविवार (10 अप्रैल) तड़के साढ़े तीन बजे के करीब धमाका हुआ, जब मंदिर परिसर में आतिशबाजी चल रही थी। (रॉयटर्स फोटो)

केरल के कोल्लम जिले में स्थित पुत्तिंगल मंदिर में आतिशबाजी के कारण हुए हादसे में एक सौ दस लोगों के मरने और तीन सौ से अधिक के घायल होने का समाचार इसकी भयावहता के साथ ही हमारी घोर लापरवाही का बयान करते हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि आतिशबाजी की अनुमति नहीं दी गई थी। लेकिन प्रशासन ने बस इतना कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया, जबकि उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि आतिशबाजी वास्तव में नहीं हो। क्या उसके पास पुलिस और खुफिया तंत्र नहीं होता? दूसरी बात, प्रशासन को प्रचारित करना था कि आतिशबाजी की अनुमति नहीं है और इस आदेश का उल्लंघन रोकने के लिए जन सहयोग मांगना था कि कम से कम पुलिस और प्रशासन को सूचना दे सकें। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके अलावा टीवी पर आतिशबाजी के लिए लाए गए बमों की मात्रा और आकार, दोनों हैरान करने वाले हैं, मानो युद्ध की तैयारी हो रही हो! आजकल समझ नहीं आता कि मेले हों, सांस्कृतिक महोत्सव हों या शादी-विवाह, छोटे-बड़े शहरों और गांवों तक में आतिशबाजी का इतना चलन क्यों है, जबकि हमारी हवा पहले ही जहरीली हो चुकी है। एक संकरी, चारों तरफ इमारतों से घिरी जगह में ये सब होना हादसे को दावत नहीं तो और क्या है?

लेकिन विडंबना यह है कि हम पुराने हादसों से सबक नहीं ले सकते और ‘कॉमन सेंस’ नाम की चीज न प्रशासन में दिखती है, न आम लोगों में। लोग हादसे रोकने या इनसे होने वाले नुकसान को कम करने के उपायों को अमल में लाने के बजाय हादसे होने देते हैं और फिर रोते हैं। सरकारें मुआवजे की घोषणा करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाती हैं। हर बार ऐसी घटनाएं होती हैं, जांच समिति या आयोग गठित होते हैं। फिर लंबे समय बाद इनकी जांच रिपोर्ट आने तक हम उस हादसे को ही भूल जाते हैं। जब तक सरकार और लोगों की सोच नहीं बदलती ऐसे हादसे नहीं रुक सकेंगे। (कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड)
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कट्टरता के नासूर
नजीमुद्दीन समद की हत्या बांग्लादेश में धर्म के नाम पर चल रहे अत्याचार की एक ताजा कड़ी है। समद कि गलती केवल इतनी थी कि वह कट्टरपंथी इस्लाम और देश की व्यवस्था से असंतोष रखता था। पर कट्टरपंथियों की नजर में वह इस्लाम को नुकसान पहुंचा रहा था। क्या बांग्लादेश की स्थापना इसी तथाकथित धर्म की रक्षा के लिए हुई थी? अगर ऐसा होता तो मुसलिम पहचान वाले लोग भाषा और संस्कृति के नाम पर अलग देश क्यों लेते! मगर अपनी स्थापना के तुरंत बाद से ही यह देश अपने उद्देश्यों से लगातार भटका है। बंगाली मानुष की लड़ाई की बात भूल कर शेख मुजीब अखिल इस्लामवाद के पाकिस्तानी झांसे में आ गए और कट्टरपंथ के सामने नरमी दिखाने लगे। बहुदलीय धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को निरंकुश एकतंत्र में बदलने दिया गया।

हालांकि वे खुद उसी कट्टरपंथ के शिकार भी हुए। आगे चल कर सैनिक शासन के दौर में देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदल कर इस्लाम को राष्ट्रधर्म घोषित किया गया। शेख हसीना के नेतृत्व में पिछले एक दशक के लोकतंत्र से बड़ी आशाएं थीं। पर हत्या और हिंसा की लगातार घटनाओं से मोहभंग होता जा रहा है। अखबारों के दूसरे पृष्ठ पर छपने वाली अंतरराष्ट्रीय खबरों की सामान्यता और एक व्यक्ति की हत्या से इतर यह गंभीर और सोचने वाली बात है, क्योंकि घटना की जिम्मेदारी आइएस ने ली है और ढाका से कोलकाता की दूरी भी अधिक नहीं है। यों भारत में भी यह नासूर तेजी से गहरा होता जा रहा है। नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और कलबुर्गी जैसे लोगों की हत्याएं इसकी गवाह हैं। (अंकित दूबे, जेएनयू, दिल्ली)
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विकास के बजाय
महंगाई देश में तांडव कर रही है, किसानों की फसलें तबाह हो गर्इं, तो कुछ ने कर्ज के बोझ तले आत्महत्या कर ली। अपराध का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर चढ़ा है, प्रशासन व्यवस्था चरमरा रही है। इस सबके बीच सम्मान वितरण का कार्यक्रम अजीब लगता है। बल्कि अब सम्मान वितरण एक तरह का ढकोसला लगती है। सवाल है कि क्या यह सम्मान वितरण बोलने वालों को चुप करने के लिए किया जा रहा है। स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, शिक्षित बेरोजगारी की मार, किसानों की आत्महत्या की घटनाएं, सांप्रदायिक तनाव, नेताओं के अनर्गल बयान, ऐसी कई समस्याओं के साथ संघर्षरत उत्तर प्रदेश। ऐसे में विकास के दावे हास्यास्पद लगते हैं। (प्रियंका श्रीवास्तव, दिल्ली)
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परंपरा या इंसानियत
भारत एक विविधताओं से भरा देश है। यहां कई धर्मों के लोग निवास करते हैं और विभिन्न प्रकार से प्राचीन मान्यताओं और परंपराओं का निर्वाह करते हैं। लेकिन आवश्यकता आज उन परंपराओं के पुनर्मूल्यांकन की है, जिनका अनुसरण करने से जन-धन की हानि की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं। केरल के पुत्तिंगल मंदिर में परंपरा के नाम पर आतिशबाजी से लगी आग से हुए जान-माल के व्यापक नुकसान ने भारतीय समाज को सोचने को मजबूर कर दिया है कि आधुनिक समय में उन्हें मानवीय जीवन अधिक प्रिय है या जोखिम भरी परंपरा! (सालिम मियां, एएमयू, अलीगढ़)
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लूट की रेल
देहरादून से मुरादाबाद जाने-आने का किराया क्रमश: एसी-3 और एसी-2 का दो व्यक्तियों का इक्कीस और तेईस अप्रैल का आरक्षण किराया 575+815=1390। इसे तेरह से पंद्रह दिन पहले ही आठ अप्रैल को निरस्त करवाने पर 380+420=800 काट लिया जाता है। लगभग 590 वापस किया जाता है। अगर बारह-चौदह घंटे पहले निरस्त कराना पड़े तो शायद उलटे पैसे देने पड़े।
एक और मामला मुंबई से दिल्ली आने वाली 04419 सुविधा एक्सप्रेस का किराया 3575 यात्रा, समय चौबीस घंटे। वहीं 12951 राजधानी एक्सप्रेस का किराया 2865, समय करीब साढ़े पंद्रह घंटे। यह सब लूट नहीं तो और क्या है?
(यश वीर आर्य, नई दिल्ली)

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