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श्रमिकों से छल

दिल्ली के श्रममंत्री गोपाल राय ने बड़े जोर-शोर से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मजदूरों के वेतन में बढ़ोतरी का ऐलान किया। अब अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी दर 9,048 रुपए प्रति माह होगी। अर्ध-कुशल श्रमिकों को 10,010 रुपए और कुशल श्रमिकों को 10,998 रुपए प्रति माह मिलेंगे। वैसे कागजों पर न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी कोई […]

Author April 10, 2015 11:05 PM

दिल्ली के श्रममंत्री गोपाल राय ने बड़े जोर-शोर से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मजदूरों के वेतन में बढ़ोतरी का ऐलान किया। अब अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी दर 9,048 रुपए प्रति माह होगी। अर्ध-कुशल श्रमिकों को 10,010 रुपए और कुशल श्रमिकों को 10,998 रुपए प्रति माह मिलेंगे। वैसे कागजों पर न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी कोई नई घटना नहीं है। इससे पहले शीला दीक्षित सरकार में भी ऐसी वेतन बढ़ोतरी होती रहती थी। लेकिन असल सवाल यह है कि कागजों पर हुई इस वृद्धि का लाभ मजदूरों को मिलेगा भी या नहीं?

अगर मजदूरों के हालात पर नजर डाली जाए तो मौजूदा समय में दिल्ली में साठ लाख मजदूर तमाम क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इनका 95 फीसद हिस्सा असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत है। इसमें से एक-तिहाई आबादी व्यापारिक प्रतिष्ठानों, होटलों और रेस्तरांओं आदि में लगी हुई है। करीब सत्ताईस प्रतिशत हिस्सा मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र, यानी कारखाना उत्पादन में लगा हुआ है। जबकि निर्माण क्षेत्र यानी इमारतें, सड़कें, फ्लाईओवर आदि बनाने का काम करने में भी लाखों मजदूर लगे हुए हैं। ये ज्यादातर मजदूर बारह-चौदह घंटे खटने के बाद बमुश्किल छह से सात हजार रुपए कमा पाते हैं। यानी मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी कानून या आठ घंटे काम करने के कानून का कोई मतलब नहीं रह जाता है बाकी ईएसआई, भविष्य निधि जैसी सुविधाएं तो बहुत दूर की बात है। दिल्ली की शान कही जाने वाली जाने वाली मेट्रो रेल में तो न्यूनतम मजदूरी की सरेआम धज्जियां उड़ाई जाती हैं।

वैसे खुद दिल्ली सरकार की मानव विकास रपट 2006 में यह स्वीकार किया गया है कि ये मजदूर जिन कारखानों में काम करते हैं उनमें स्थितियां इंसानों के काम करने लायक नहीं हैं। साफ है कि देश की राजधानी में जब मजदूर इतनी अमानवीय, नारकीय स्थितियों में काम कर रहे हैं तो पूरे देश के मजदूरों की दशा क्या होगी। वैसे देश के संविधान में मजदूरों के हित के लिए 260 श्रम कानून बनाए गए हैं लेकिन ये श्रम कानून ‘शर्म कानून’ बनकर रह गए हैं। आज सभी मजदूर साथी जानते हैं कि सारे श्रम कानून ठेकेदारों और मालिकों की जेब में रहते हैं। दूसरी ओर कानूनों को लागू करने वाले श्रम विभाग में चपरासी से लेकर अफसरों तक घूस का तंत्र चलता है।
‘पैसा फेंको, तमाशा देखो!’ और ऐसा भी नहीं है कि इस गोरखधंधे की खबर नेताओं-मंत्रियों को न हो। क्योंकि दिल्ली में ही कई बड़े नेताओं की फैक्टरियां चल रही हैं जहां कोई श्रम कानून लागू नहीं होता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि दिल्ली के आप सरकार के पूर्व श्रममंत्री की मादीपुर में चलने वाली फैक्टरी में भी सभी श्रम कानून लागू नहीं होते हैं। साथ ही वजीरपुर, बवाना से लेकर करावल नगर में कई फैक्टरी मालिक-बड़े दुकानदार आम आदमी पार्टी में शामिल हैं जो आपने मजदूरों को खुद न्यूनतम मजदूरी तक नहीं देते। ऐसे में न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी मजदूरों के साथ एक मजाक से ज्यादा कुछ नहीं।

वैसे भी आज सरकार जिन मापदंडों पर न्यूनतम मजदूरी तय करती है वे नाकाफी और अधूरे हैं क्योंकि इनमें केवल मजदूर की भोजन संबंधी आवश्यकताओं को ही आधार बनाया जाता है। इसलिए न्यूनतम मजदूरी रेखा वास्तव में कुपोषण-भुखमरी रेखा है।
सनी सिंह, वजीरपुर

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