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चौपालः विलंबित न्याय

दो पक्षों में विवाद के बीच अक्सर सुना जाता है कि ‘मैं तुम्हें कोर्ट में देख लूंगा’। इससे साफ है कि लोगों को पूरा विश्वास है अदालत में न्याय मिलेगा इसीलिए वे अदालत में ‘देख लेने’ की बात कहते हैं।

Author April 29, 2016 3:33 AM
(File Photo)

दो पक्षों में विवाद के बीच अक्सर सुना जाता है कि ‘मैं तुम्हें कोर्ट में देख लूंगा’। इससे साफ है कि लोगों को पूरा विश्वास है अदालत में न्याय मिलेगा इसीलिए वे अदालत में ‘देख लेने’ की बात कहते हैं। इसके बरक्स देश के मुख्य न्यायाधीश का प्रधानमंत्री और मीडिया के सामने भावुक हो जाना क्या दर्शाता है? दरअसल, उनकी भावुकता में बेबसी, लाचारी और मजबूरी साफ-साफ झलकती है। विधि आयोग हर बार केंद्र सरकार से सिफारिशें करता है पर सरकार उन पर ध्यान नहीं देती। देश की न्यायपालिका के जो हालात हैं वे कोई अचानक पैदा नहीं हुए हैं, बल्कि सरकारों ने कभी इस ओर दिलचस्पी दिखाई ही नहीं। जिन लोगों पर न्यायपालिका को इस संकट से उबारने की जिम्मेदारी है उनमें से पैंतीस फीसद पर कोई न कोई मुकदमा चल रहा है। कई ‘माननीयों’ पर तो हत्या, अपहरण, बलात्कार और महिला उत्पीड़न जैसे आरोप भी हैं जो इस कारण संसद या विधानसभाओं में पहुंच गए हैं कि तीन करोड़ फाइलों के नीचे उनकी फाइल भी दबी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट में जजों के इकतीस पद स्वीकृत है जिनमें से छह खाली हैं। चौबीस उच्च न्यायालयों में 1056 और निचली अदालतों में जजों के 20,414 पद स्वीकृत हैं जिनमें क्रमश: 465 और 4580 पद रिक्त पड़े हैं। जजों के अतिरिक्त न्यायिक अधिकारियों की भी भारी कमी है। इसी का नतीजा है कि आज मुल्क में तीन करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं जिनमें तेईस लाख से ज्यादा मामले दस साल से भी अधिक समय से चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में साठ हजार से ज्यादा और उच्च न्यायालयों में करीब इकतालीस लाख मामले लंबित हैं जबकि निचली अदालतों में यह आंकड़ा ढाई करोड़ के करीब है। राजस्थान में 1024 अदालतें ऐसी हैं जिनमें से करीब दो सौ के पास ही अपना भवन है, बाकी सब किराए के भवनों में चल रही हैं।

ऐसी स्थिति पूरे देश की है। न्यायपालिका के इस संकट को देखते हुए क्या हम मानें कि देश में आर्थिक संकट है? बिल्कुल नहीं। जिस देश से एक सांसद और उद्योगपति सरकार की देखरेख में नौ हजार करोड़ रुपए लेकर भाग गया हो उस देश में आर्थिक संकट तो नहीं हो सकता है, सिर्फ और सिर्फ इच्छाशक्ति की कमी है। जब भी सांसदों और विधायकों के वेतन में वृद्धि की बात आती है तो सदन में पक्ष और विपक्ष एकजुट हो जाते हैं। पिछले दिनों कई राज्य सरकारों ने ध्वनिमत से ऐसे कानून पास किए हैं लेकिन जब भी आम आदमी से जुड़े मामले सदन में उठाए जाते हैं तो हल्ला, प्रदर्शन और माइक तोड़कर सदनों में कामकाज रोक दिया जाता है। आखिर ऐसा क्यों? और कब तक?
’सूरज कुमार बैरवा, सीतापुरा, जयपुर

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