ताज़ा खबर
 

चौपाल: न्याय को अंगूठा

देश की आजादी के बाद मोदी सरकार ही पहली ऐसी सरकार है जिसके काल में न्यायपालिका को उसकी गलत और संविधान विरुद्ध कार्यप्रणाली के कारण बार-बार हस्तक्षेप करने पड़े हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: August 30, 2016 3:59 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (FILE PHOTO)

मोदी सरकार की कार्यशैली न्याय को निरंतर अंगूठा दिखाने वाली रही है। यह भी ध्यान देने की बात है कि देश की आजादी के बाद मोदी सरकार ही पहली ऐसी सरकार है जिसके काल में न्यायपालिका को उसकी गलत और संविधान विरुद्ध कार्यप्रणाली के कारण बार-बार हस्तक्षेप करने पड़े हैं। पिछले दिनों पंद्रह अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के ठीक बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर ने कहा कि प्रधानमंत्री ने अपने डेढ़ घंटे के भाषण में न्याय के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला। उन्होंने कहा कि न्याय मिलने में देरी इंसाफ नहीं है। गौरतलब है कि इससे पहले मुख्य न्यायाधीश ने अदालत में अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी को साफ-साफ यह कहते हुए अपनी पीड़ा जताई थी कि सरकार के पास पचहत्तर जजों की नियुक्ति की सूची दो माह से अधिक समय से पड़ी हुई है; वह उस पर निर्णय क्यों नहीं कर रही है? क्या इसके लिए भी हमें कोई न्यायिक आदेश जारी करना होगा?

कितने अफसोस की बात है कि अपने काम की फुर्ती का जब-तब डंका पीटते रहने वाले प्रधानमंत्री के न्यायपालिका से संबधित कामकाज के ढीले रवैये पर शीर्ष न्यायालय को इतनी कठोर टिप्पणी करनी पड़ी है! मुख्य न्यायाधीश इससे पूर्व विज्ञान भवन में एक सेमीनार के अवसर पर प्रधानमंत्री की मौजूदगी में जजों की कमी का रोना रो चुके हैं। उन्होंने भावुक होकर इतना तक कह दिया था कि अगर सारी छुट्टियां खत्म कर दिन-रात लंबित प्रकरणों की सुनवाई की जाए तब भी वे खत्म होने वाले नहीं हैं। अदालतों में लंबित मामलों का अंबार लगा है। काम के अनुपात में जहां पचास जजों को होना चाहिए वहां एक जज काम कर रहा है। 1987 में विधि आयोग की अनुशंसा के अनुसार दस लाख आबादी पर पचास जज होने चाहिए लेकिन देश में प्रति दस लाख आबादी पर सिर्फ सोलह-सत्रह जज काम कर रहे हैं। 1987 की अनुशंसा के अनुसार उस समय चौवालीस हजार जजों की जरूरत थी जो आज बढ़े कार्यबोझ के अनुसार सत्तर हजार हो गई है। इसके अतिरिक्त कोर्ट में आधारभूत सुविधाओं का सर्वत्र अभाव है। न्याय का देर से मिलना, न्याय नहीं होने के बराबर है।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। जनसत्‍ता टेलीग्राम पर भी है, जुड़ने के ल‍िए क्‍ल‍िक करें।

Next Stories
1 चौपाल: खेलों की सुध
2 चौपालः कश्मीरियत के साथ
3 चौपाल: खिलवाड़ का खेल
ये पढ़ा क्या?
X