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चौपालः क्या बदला

आजादी से पहले हम गरीबी, बेरोजगारी, असुरक्षा, अशिक्षा और जात-पात जैसी समस्याओं से जूझ रहे थे और आज भी इन्हीं समस्याओं से लड़ रहे हैं। भ्रष्टाचार और कई तरह के अपराधों में पहले के मुकाबले काफी ज्यादा इजाफा हो गया है

Author April 9, 2018 06:31 am
यदि ऐसे हिंसक आंदोलनों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो कोई न कोई वर्ग ऐसी आग लगाता रहेगा और नुकसान उस आम नागरिक को उठाना पड़ेगा जिसका इन सबसे कुछ लेना-देना नहीं।

क्या बदला

आजादी से पहले हम गरीबी, बेरोजगारी, असुरक्षा, अशिक्षा और जात-पात जैसी समस्याओं से जूझ रहे थे और आज भी इन्हीं समस्याओं से लड़ रहे हैं। भ्रष्टाचार और कई तरह के अपराधों में पहले के मुकाबले काफी ज्यादा इजाफा हो गया है। भ्रष्टाचार तो हमारे जीवन में इस कदर घुल चुका है कि उससे उबरने का कोई रास्ता नजर नहीं आता। हम कहने को आजाद हैं, लेकिन हमें वास्तविक आजादी नहीं मिली है। हर कोई खुद को असुरक्षित महसूस करता है। व्यवस्था इतनी गड़बड़ हो गई है कि छात्रों को शिक्षा में सुधार के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है। युवा नौकरी के लिए भटक रहे हैं। स्त्रियां घर या बाहर, कहीं महफूज नहीं हैं। ऐसे में विचारणीय है कि अगर हमारी समस्याएं वही हैं तो हमने अब तक किया क्या? शासक बदल गए, पर शासन करने का तरीका कब बदलेगा, पता नहीं।

’अमनप्रीत कौर, पीयू, चंडीगढ़

नियम के विरुद्ध

आम जनता की आम-समझ कहती है कि कानून के शासन में जहां हर काम के लिए विधि-विधान हैं, किसी सार्वजनिक काम को करने के लिए नियमों को परे रखना। नियमों से अलग जाने वालों के लिए लोगों की समझ यह है कि इसमें उनका कोई न कोई आर्थिक लाभ छुपा होगा। लिहाजा, भ्रष्टाचार का मामला बनता है। देश में तमाम ऐसे मामलों के मूल में नियमों के परे जाकर काम करना ही है। तो जब नेता ऐसा करता है तब भ्रष्टाचार कहलाता है और बौद्धिक ऐसा करे तो इस मामले को भ्रष्ट गतिविधि कहे जाने से उसे छूट क्यों मिलनी चाहिए? जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में एमफिल हिंदी की प्रवेश परीक्षा सत्र 2018-19 में 12 सीटों के लिए शामिल 749 उम्मीदवारों में से केवल चार को चुना जाना शक पैदा करता है। साथ ही जेएनयू से पढ़े सभी पोस्ट ग्रेजुएट्स के शोध की इस प्रवेश परीक्षा में फेल कर जाना बहुत बड़ी बात थी।

इसके मूल में यूजीसी का वह कानून था जो अब जेएनयू में लागू है कि प्रवेश परीक्षा में पचास फीसद अंक हासिल करना पास करने के लिए अनिवार्य होगा। लेकिन कॉपी जांचने वालों ने इसे जान-बूझ कर दरकिनार किया और मनमाने ढंग से ‘कट आॅफ’ बनाई। इससे यह हुआ कि 745 उम्मीदवार सीधे छांट दिए गए। पूछने पर कॉपी जांचने वाले प्रोफेसरों ने इस नियम से अनभिज्ञता जताई। मैंने जेएनयू प्रशासन से आरटीआई की मदद से जो सूचना मांगी उसके उत्तर में स्पष्ट कहा गया है कि कोई कट आॅफ नहीं था, न्यूनतम पचास प्रतिशत की बाध्यता थी। अब मूल्यांकन प्रक्रिया में शामिल प्रोफेसरों की आपराधिक लापरवाही, नियमों को परे रख कर मनमाना काम करना आदि को हम किस श्रेणी में रखें? क्यों नहीं इसे भ्रष्टाचार का मामला समझा जाए?

अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

बंद में हिंसा

पिछले दिनों भारत बंद के दौरान जिस प्रकार आतंक का माहौल बनाते हुए हत्या, लूट, तोड़फोड़ और आगजनी हुई उसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। लेकिन केवल निंदा से कुछ नहीं होगा जब तक कि दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई न जाए। आश्चर्य की बात है कि किसी भी राजनीतिक दल ने इसकी खुल कर आलोचना नहीं की। क्या प्रजातंत्र में यही सब होगा? यदि ऐसे हिंसक आंदोलनों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो कोई न कोई वर्ग ऐसी आग लगाता रहेगा और नुकसान उस आम नागरिक को उठाना पड़ेगा जिसका इन सबसे कुछ लेना-देना नहीं।
यश वीर आर्य, देहरादून

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