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स्त्री के विरुद्ध

लगभग दो साल पहले दिल्ली में एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार की बर्बर घटना के बाद देश भर में हुए आंदोलन और तात्कालिक तौर पर सरकार की ओर दिखाई गई सक्रियता के बाद उम्मीद जगी थी कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में कमी आएगी। लेकिन सरकारी आंकड़े इसके उलट हकीकत का बयान […]

लगभग दो साल पहले दिल्ली में एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार की बर्बर घटना के बाद देश भर में हुए आंदोलन और तात्कालिक तौर पर सरकार की ओर दिखाई गई सक्रियता के बाद उम्मीद जगी थी कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में कमी आएगी। लेकिन सरकारी आंकड़े इसके उलट हकीकत का बयान करते हैं। खुद राष्ट्रीय महिला आयोग के पास पहुंची शिकायतों में पिछले दो सालों के दौरान सौ फीसद बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक 2012 में आयोग के पास पहुंची यौन उत्पीड़न की शिकायतों की तादाद जहां एक सौ सड़सठ थी, वहीं इस साल वह बढ़ कर तीन सौ छत्तीस तक पहुंच गई है।

यहां सवाल है कि इस बीच लोगों में इतने बड़े पैमाने पर आक्रोश पैदा होने, महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के खिलाफ लगातार चलने वाले जागरूकता अभियानों और सख्त कानून लागू करने के सरकारी दावों के बावजूद ऐसा क्यों हुआ कि यौन उत्पीड़न के मामलों में दो गुना तक बढ़ोतरी हो गई! गौरतलब है कि सरकार ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन-उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) कानून, 2013 लागू किया हुआ है, जिसके तहत निजी या सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने की जगहों पर उम्र या रोजगार की प्रकृति में अंतर किए बिना सभी महिलाओं को यौन हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान किया गया है। लेकिन सच यह है कि इस कानून के अमल में आने के बावजूद कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों में चौंतीस फीसद की बढ़ोतरी हुई है। यह सही है कि बढ़ती सामाजिक सक्रियता के चलते शिकायत दर्ज करने के लिए महिलाएं सामने आने लगी हैं। लेकिन इसी के साथ यह भी हकीकत है कि अपराधों की दर में कमी नहीं आई है और इसके लिए मुख्य रूप से कानून-व्यवस्था में व्यापक कमियां जिम्मेदार रही हैं। सभी जानते हैं कि आज भी बहुत सारे मामलों की शिकायत पुलिस में दर्ज नहीं कराई जाती। लेकिन सिर्फ दर्ज शिकायतों पर अगर पुलिस कार्रवाई करे तो कायदे से अपराधों में कमी आनी चाहिए।

राष्ट्रीय महिला आयोग के पास पहुंचने वाली शिकायतों में लगातार वृद्धि से साफ पता चलता है कि ऐसा नहीं हो पा रहा है। दरअसल, जब भी महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों से संबंधित कोई रपट आती है या कोई बड़ी घटना होती है तो सरकार और पुलिस की ओर से अपराधियों पर नकेल कसने की बात दोहराई जाती है। मगर भरोसा दिलाने और पुलिस की व्यावहारिक कार्यशैली में आमतौर पर बहुत फासला रहा है। सवाल है कि यौन उत्पीड़न के दर्ज मामलों में भी अदालती कार्यवाही में देरी और सबूतों के अभाव में आरोपियों के बरी हो जाने के पीछे आखिर क्या वजहें होती हैं? क्या यह सच नहीं है कि कानूनी जटिलताओं और अदालती कार्यवाही में बेहद असुविधाजनक हालात के चलते भी कई बार महिलाओं को अपने पांव पीछे खींच लेने पड़ते हैं? यह संयोग नहीं है कि बलात्कार के मामलों में सजा की दर बहुत कम रही है। मुश्किल यह भी है कि सरकारों की निगाह में सामाजिक विकास के प्रश्न हमेशा हाशिये पर रहते हैं या फिर उनकी अनदेखी की जाती है और सारी ऊर्जा केवल अर्थव्यवस्था के ऊंचे ग्राफ को विकास का पैमाना बताने में खर्च की जाती है। सवाल है कि अगर इतनी बड़ी तादाद में महिलाएं लगातार अपराधों का शिकार हो रही हैं या उनके बीच असुरक्षा का माहौल बना हुआ है तो उसमें विकास को कैसे देखा जाना चाहिए!

अनिल धीमान, नंदनगरी, दिल्ली

 

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