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जदयू का जहाज

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब आरसीपी को जदयू की इतना चिंता है, तो वे पार्टी के साथ रह कर भी अपनी प्रतिक्रिया दे सकते थे।

जदयू का जहाज
आरसीपी सिंह के साथ नीतीश। (एक्सप्रेस फोटोः प्रेमनाथ पांडेय)

बिहार में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह ने पिछले दिनों आचानक मीडिया में आकर जदयू से अपना रिश्ता तोड़ने की बात कह गए। उन्होंने जदयू को डूबता हुआ जहाज कहा, जिस पर जदयू प्रमुख का कहना है कि जदयू द्वारा आरसीपी से अकूत संपत्ति जुटाने का विवरण मंगा गया था, जिससे बचने के लिए वे ऐसी बातें कर रहे हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब आरसीपी को जदयू की इतना चिंता है, तो वे पार्टी के साथ रह कर भी अपनी प्रतिक्रिया दे सकते थे। इससे साफ है कि आरसीपी अपने पर लगे अकूत संपत्ति के मामले से बचना चाहते हैं। आगे देखने की बात है कि क्या आरसीपी अपने पर लगे आरोप को साफ करते या जदयू को डूबता हुआ जहाज बता कर अपनी राजनीतिक फिर से चमकाते हैं।
मुकेश कुमार, मोतिहारी

लोकतंत्र का मजाक

हमारे देश में कुछ ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं, जो सोचने पर मजबूर करती हैं कि जिस लोकतंत्र की गाथा हम बड़े गर्व से गाते हैं, उस लोकतंत्र को हम जमीनी स्तर पर लागू नहीं कर पाए। मामला मध्यप्रदेश के दमोह जिले का है, जहां हाल ही में निर्वाचित हुई ग्यारह महिला सरपंचों की जगह उनके पतियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। सोच कर देखिए, घटना सुनने और देखने में आम लग सकती है, लेकिन अपने आप में हमारी व्यवस्था के लिए शर्मिंदगी का विषय है।

ऐसी ही घटनाएं हमें अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में पीछे धकेल देती हैं और यह सवाल पैदा होता है कि जब हमने महिला सशक्तिकरण को बढ़ाने के लिए महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए उनके लिए सीट आरक्षित की है, तो फिर उनका क्या महत्त्व रह जाता है। क्या किसी को संविधान, कानून, सरकार का भय नहीं। क्या इन सरपंचों को शपथ दिलाने वाले सचिव इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। क्या वे नहीं जानते थे कि यह सब असंवैधानिक और गैरकानूनी है। सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए और भविष्य में ऐसी कोई घटना न घटे इसके लिए उचित और बेहतर कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि हम महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ लोकतंत्र में लोगों का विश्वास पैदा कर सकें।
सौरव बुंदेला, भोपाल</p>

महंगाई का दंश

महंगाई के कारण ही भारतीय रिजर्व बैंक को रेपो रेट 0.50 प्रतिशत बढ़ाना पड़ा है। दूसरी तरफ वरिष्ठ नागरिकों के बैंकों में जमा पर कोई बढ़ोतरी नही की जा रही। बीमा कंपनियों ने स्वाथ्य बीमा के प्रीमियम दोगुने से भी अधिक कर दिए। रही सही कसर जीएसटी ने निकाल दी। बुढ़ापे में केवल पेंशन लोगों का सहारा होती है, पर पेंशन पर आयकर काटा जाता है और एफडी पर टीडीएस। इस तरह वरिष्ठ नागरिकों पर दोहरी मार पड़ती है। सरकार को वरिष्ठ नागरिकों पर कर का भार कम से कम करना चाहिए और महंगाई की मार से बचने के लिए महंगाई भत्ते के साथ-साथ वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष जमा योजना लानी चाहिए, ब्याज बढ़ाना चाहिए।
आरके शर्मा, रोहिणी, दिल्ली

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