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चौपाल: राज्य का कर्तव्य

सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए वर्गों के प्रतिनिधित्व से संबंधित अनुच्छेद 15(4), (5) और 16(4), (4अ) संविधान के ‘मूल अधिकार’ भाग के अंतर्गत आते हैं, जिसे लागू करना राज्य का कर्तव्य बनता है।

Author Updated: February 19, 2020 4:55 AM
सरकार के ‘दूत’ से महिलाएं नाराज हो गईं। (फोटो सोर्स – Indian Express, Abhishek Angad)

हाल ही में आए ‘मुकेश कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य’ के फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दो सदस्यों के खंडपीठ ने दो महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं। 1- आरक्षण लागू करना या न करना राज्य की मर्जी पर निर्भर करता है, 2- आरक्षण किसी का मौलिक अधिकार नहीं है, इसलिए अदालत सरकार को आरक्षण लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती है। गौरतलब है कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए वर्गों के प्रतिनिधित्व से संबंधित अनुच्छेद 15(4), (5) और 16(4), (4अ) संविधान के ‘मूल अधिकार’ भाग के अंतर्गत आते हैं, जिसे लागू करना राज्य का कर्तव्य बनता है।

सर्वोच्च अदालत ने ‘एनएम थॉमस बनाम केरल राज्य’ के मामले में यह मत जाहिर किया था कि अनुच्छेद 16-1 (राज्य के अधीन नियुक्तियों में अवसर की समानता) को 16(4) के साथ पढ़ा जाना चाहिए । वहीं ‘नालसा बनाम भारत संघ’ के वाद में उच्चतम न्यायालय ने ट्रांसजेंडर समुदाय को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा मानते हुए आरक्षण देने की बात कही थी। यदि आरक्षण लागू करना या न करना राज्य की मर्जी पर निर्भर करता है, तो फिर पूर्व में न्यायालय ने उन याचिकाओं को स्वीकार करते हुए फैसला कैसे सुना दिया था जोकि सरकारों द्वारा किए गए विभिन वर्गों के लिए आरक्षण के प्रावधान के विरुद्ध दायर की गई थीं। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय, पूर्व के निर्णयों के साथ ही संविधान की मूलभावना का भी विरोधाभासी है।
’आदित्य राव, कानपुर, उत्तर प्रदेश

विरोध की जगह
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अपने अधिकारों के लिए लड़ना या विरोध करना वाजिब है, लेकिन अपने द्वारा किए जा रहे प्रदर्शन या विरोध से किसी भी आम या खास जन को परेशान होती है तो वह प्रदर्शन या धरना ठीक नहीं है। जनता को प्रदर्शन या विरोध करने से पहले यह तय करना होगा कि उनसेकिसी को परेशानी तो नहीं हो रही है। यही जायज तरीका है। देखने में आता है कि जब सत्ताधारियों के समर्थक इस प्रकार के प्रदर्शन करते हैं तो सरकार नरम रुख अपनाती है। इसके विपरीत विरोधियों पर अपना कड़ा रुख अपनाती है।

यह प्रजातंत्र में न्याय के सिद्धांत को प्रभावित करने वाला होता है। इस प्रकार के दोहरे व्यवहार से मनमानी का बढ़ना लाजमी है। चाहे अपने हों या पराए, आम हो या खास, अगर वह विरोध करने का गलत तरीका अपना रहा है तो उसके साथ भी वही कड़ाई होना चाहिए जो न्यायोचित है। शाहीन बाग में प्रदर्शन करने वालों को ऐसी जगह बैठ कर विरोध करना चाहिए जहां किसी को कोई परेशानी न हो। यही अदालत की मूल भावना है, जिसे समझना होगा।
’हेमा हरि उपाध्याय अक्षत, उज्जैन

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