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कथनी बनाम करनी

साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों पर सरकार और सत्तारूढ़ दल जिस प्रकार आक्रामक हो रहे हैं, उन पर जिस तरह के इल्जाम लग रहे हैं और जो भाषा बोली जा रही है..

Author नई दिल्ली | October 27, 2015 5:44 PM

साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों पर सरकार और सत्तारूढ़ दल जिस प्रकार आक्रामक हो रहे हैं, उन पर जिस तरह के इल्जाम लग रहे हैं और जो भाषा बोली जा रही है उससे साहित्यकारों की बात ही सही साबित होती है। सर्वप्रथम, जो भाषा प्रयोग में लाई जा रही है उससे सत्तासीन दल का कलम के सिपाहियों के प्रति रुख स्पष्ट हो जाता है। यदि वे लोग तथाकथित दरबारी भी होते तो सत्ता की गरिमा को ध्यान में रख कर भाषा में संयम बरता जाना चाहिए था।

दूसरा, क्या सरकार या सत्तारूढ़ दल लोगों को बताएंगे कि किसको, किस मुद्दे पर और किस तरह अपना विरोध प्रकट करना चाहिए। यदि कलम के सिपाही कलम चलाने के लिए अनुपयुक्त वातावरण होने की शिकायत कर रहे हैं तो अपने आक्रामक रुख से सरकार इसे सही साबित कर रही है। यदि सरकार साहित्यकारों के बजाय समाज में असहिष्णुता फैलाने वाले तत्त्वों के विरुद्ध आक्रामक होती तो समाज में सुरक्षा का वातावरण बनता। देश के नागरिक अमन के वातावरण में जीते और इससे सरकार की गरिमा भी बढ़ती।

दादरी की घटना की दंगों में हुई हिंसा से तुलना करना और साहित्यकारों पर तब प्रतिकार नहीं करने का इल्जाम लगाना बेमानी है। कारण, दंगों में हिंसा व्यक्ति की जाति या धर्म के नाम पर होती है। लेकिन दादरी में फ्रिज में रखी खाने की वस्तु के कारण उकसाई भीड़ ने घर के मालिक को पीट-पीट कर मार डाला। यानी अब असामाजिक तत्त्व सामाजिक से व्यक्तिगत स्तर पर हस्तक्षेप करने लगे हैं।

वे घर के भीतर भी त्कझांक करने लगे हैं। सरकार के मंत्रियों ने आरोपियों को बचाने के लिए घटना को कम करके आंका और आरोपियों को बचाने की पुरजोर कोशिश की। कलम से लिखने में कब किसकी भावनाएं आहत हो जाएंगी, यह कोई नहीं जानता। इसलिए जो बाबा नागार्जुन आदि का उदाहरण दे रहे हैं और सुझाव दे रहे हैं कि पुरस्कार लौटाने के बजाय कलम चलाएं, वे भूल जाते हैं कि सही या गलत कानून की आड़ लेकर जेल भेजने या भीड़ द्वारा लाठी या गोली से सड़क पर मारे जाने में फर्क होता है।

यह कहना भी सही नहीं है कि साहित्यकारों ने 1984 के दंगों का विरोध नहीं किया। इतिहास जानता है कि इस देश के संवेदनशील लोगों ने हर प्रकार की हिंसा का अपने-अपने तरीके से प्रतिकार किया है और अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार पीड़ितों तक मदद पहुंचाने की कोशिश की है। इसलिए इतिहास का गलत उदाहरण देने से आप अपना दोहरापन ही सिद्ध कर रहे हैं। यही तो आज हर संवेदनशील व्यक्ति की विडंबना है। आप बोलते कुछ हैं, करते कुछ और हैं।
गोपा जोशी, दिल्ली

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प्रकृति के साथ

आरके सिन्हा का लेख ‘नदियां निर्मल कैसे होंगी’ (20 अक्तूूबर) पढ़ा। उन्होंने मूर्तियों के विसर्जन से होने वाली नदियों और पर्यावरण की दुर्दशा और जलजीवों की विलुप्ति पर चिंता प्रकट की है। विसर्जन की परंपरा पर विराम अगर कुछ लोगों के लिए धार्मिक आस्था का हनन है तो इसआस्था के सम्मान के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के उपाय किए जाने चाहिए।

एक उपाय यह है कि सरकार सख्त आदेश के जरिए इन मूर्तियों के आकार को छोटा (अधिकतम एक फुट) रखवाए और इन पर प्राकृतिक रंगों का उपयोग सुनिश्चित करके इनका विसर्जन प्रशासन द्वारा नियत स्थान पर ही होना तय करे। इससे अनेक धार्मिक विवादों और आंदोलनों को टाला जा सकेगा और यह आस्था के सम्मान के साथ प्रकृति-रक्षक भी सिद्ध होगा।
राजेश रावत, अजमेर

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तेजी का तड़का

दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश भारत है। देश में हरित क्रांति से गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा, अन्य मोटे अनाज और नगदी फसलों की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, पर दलहनी फसलों की पैदावार में खास वृद्धि देखने को अब तक नहीं मिली। हरित क्रांति ने जहां देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया, वहीं फसलों की पैदावार में भी असंतुलन ला दिया। देश चावल, गेहूं के मामले में आत्मनिर्भर हुआ है। आज दालों की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता की तुलना में गेहूं की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता चार गुना से भी ज्यादा है।

ऐसे में सरकार किसानों से लाभकारी मूल्य पर दालें खरीद सकती है और उन्हें बाजार की अनिश्चितता से बचा सकती है। इस तरह से दाल की पैदावार को प्रोत्साहन की नीति के जरिए दूरगामी शुभ परिणाम निकल सकते हैं। इससे किसानों की हालत भी सुधरेगी और गरीब की थाली में दाल भी वापस आएगी। प्रोत्साहन राशि से लाभान्वित किसान भाई दलहनी फसलों का रकबा बढ़ाएंगे, जिससे दालों की बेलगाम बढ़ती कीमतों में ठहराव भी आएगा। सरकार को चाहिए कि वह दालों की जमाखोरी पर सख्ती से लगाम लगाए और उनकी अधिक पैदावार के लिए किसानों को प्रोत्साहित करे।
पवन मौर्य, लंका, वाराणसी

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विरोध की सेना

शिवसेना ने कोई ऐसा मौका नहीं छोड़ा है जो प्रधानमंत्री मोदी के लिए असहज स्थिति या मुसीबत लेकर न आए। मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने से लेकर देश का प्रधानमंत्री बनने तक शिवसेना लगातार और मौके-बेमौके अपना विरोध बम फोड़ती रही है। पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री कसूरी की किताब के विमोचन कार्यक्रम के आयोजन कर्ता सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर कालिख पोतना, बीसीसीआइ के दफ्तर में घुसकर संभावित भारत-पाक सीरीज के विरोध को लेकर प्रदर्शन करना, जम्मू-कश्मीर में निर्दलीय विधायक रशीद के बीफ पार्टी देने के विरोध में कालिख पोतना या पाकिस्तान के मशहूर गायक गुलाम अली के कार्यक्रम को रद्द कराना, इन सभी हरकतों से शिवसैनिकों ने मोदी सरकार को मुसीबत में डालने की कोशिश की है।

पाक-विरोधी शिवसेना की इन हरकतों से जहां एक ओर मोदी सरकार को विपक्ष के कटाक्षों का सामना करना पड़ रहा है वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के विरोध से भी निपटना पड़ रहा है। देखना है कि मोदी सरकार अपनी सहयोगी शिवसेना के साथ कैसे सरकार चलाती है।
मीना बिष्ट, पालम, नई दिल्ली

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