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अपराध का स्वीकार

मुशर्रफ हों या टोनी ब्लेयर, सत्ता के सहारे पैदा किए युद्ध और आतंक के नासूरों को खुजलाते हुए अपने भस्मासुरी कृत्य कबूल कर रहे हैं। 27 अक्तूबर को एक चैनल को दिए साक्षात्कार..

Author नई दिल्ली | Published on: October 30, 2015 12:05 AM
पाकिस्‍तान के पूर्व राष्ट्रपति और सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ।

मुशर्रफ हों या टोनी ब्लेयर, सत्ता के सहारे पैदा किए युद्ध और आतंक के नासूरों को खुजलाते हुए अपने भस्मासुरी कृत्य कबूल कर रहे हैं। 27 अक्तूबर को एक चैनल को दिए साक्षात्कार में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपने किए के साथ मुल्क के पूर्व हुक्मरानों के कारनामों को बेपर्दा करते हुए स्वीकार किया कि आतंकवाद पाकिस्तान की पैदाइश है। उनके मुताबिक ‘पाकिस्तान ने कश्मीर में आतंकी भेजे, उन्हें पैसे दिए। उसने तालिबान, उसामा बिन लादेन, हक्कानी और हाफिज सईद जैसों को ट्रेनिंग दी। जिस तरह हाफिज सईद को पाकिस्तान में हीरो का दर्जा है, उसी तरह तालिबानी हक्कानी हमारा हीरो है। उसामा और जवाहिरी भी हमारे हीरो थे।’

मुशर्रफ का यह कबूलनामा कोई पहली बार नहीं है बल्कि इससे पहले भी वे कई मर्तबा ऐसे बयान दे चुके हैं और हमारी 56 इंची सीने वाली कथित राष्ट्रवादी सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार करते रहे हैं। लेकिन पहले की तरह इस बार भी इसके सीने की हवा निकली नजर आई। इस ‘ठंड’ के पीछे अमेरिका से इसके संबंध का जुड़ा होना रहा है। मोदी की सरकार हो या उनके पूूर्ववर्ती मनमोहन सिंह की, जब से हमारी सरकारों ने स्वतंत्र विदेश नीति का परित्याग कर अमेरिकी पिछलग्गूपन अपनाया है, तब से राष्ट्रवाद अमरिकावाद से संचालित है।

जो बात मुशर्रफ स्वीकार कर रहे हैं, ठीक उसी तरह की बातें करते हुए उनसे दो दिन पहले ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर भी इराक युद्ध को लेकर की गई गलती स्वीकार कर चुके हैं। उन्होंने इसके लिए बारह साल बाद माफी मांगी है। ब्लेयर ने स्वीकार किया कि इराकी तानाशाह सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए चले इराक युद्ध और उसके बाद अराजक माहौल में ‘इस्लामिक स्टेट’ आतंकी संगठन का जन्म हुआ जिसने इराक के बड़े हिस्से पर कब्जा करने के बाद अब सीरिया में भी जगह बना ली है। उन्होंने स्वीकार किया कि इराक में रासायनिक हथियारों के संबंध में हमें मिली खुफिया रिपोर्ट गलत थी जबकि हमने इराक पर हमले को इसी आधार पर जायज ठहराया था। आज इराक भारी गुटीय तनाव से जूझ रहा है। इसके लिए उस समय पश्चिमी देशों द्वारा किया गया हमला जिम्मेदार है।

तबाही थोपने वाले बुश हों या उनके जूनियर पार्टनर ब्लेयर या उनकी दलाली करने वाले मुशर्रफ के कबूलनामे विश्व मानवता के अपराधी होकर भी दंड से परे क्यों हैं? है किसी में उनको कठघरे में खड़े करने की हिम्मत? जो पाकिस्तान में 1979 में शुरू हुआ, वह भारत में वर्तमान शासन में शुरू हो गया है। यह सांप्रदायिक नकाबों में हिंदू सेना, शिवसेना, रामसेना, सनातनधर्मी सेना, प्रताप बटालियन जैसे नए-नए नामों से उसी भस्मासुरी आकार में सामने आ रहा है जिस रूप में तालिबानी आए हैं। ओवैसी जैसे इनके सहयोगी हैं। इनकी कथित धर्म से लिपटी राजनीति, किसके लिए खतरा है? क्या पूरी मानवता के लिए नहीं? (रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर)

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तब और अब

देश में बढ़ती असहिष्णुता को आधार बना कर अब सिने-संसार की बारह विभूतियों ने अपने राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाने का निर्णय लिया है। यानी पुरस्कार लेते समय भी पब्लिसिटी और लौटाते समय भी पब्लिसिटी! प्रश्न एक बार फिर वही है कि पहले ये विभूतियां चुप क्यों रहीं जबकि देश में हाल की सांप्रदायिक घटनाओं से भी बदतर घिनौनी घटनाएं पूर्व में हो चुकी हैं। तब क्या इन फिल्मकारों ने न कुछ कहने की और न कुछ देखने की कसम खा रखी थी? अब एकाएक यह हृदय-परिवर्तन क्यों और कैसे? (शिबन कृष्ण रैणा, अलवर)

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कर्ज पर कार

बहुत से सरकारी बैंक कार खरीदने के लिए कर्ज दे रहे हैं। अनेक कार निमार्ता-विक्रेता किस्तों पर कार दे रहे हैं। उधार पर या किस्तों पर होने से हर कोई कार लेने के चक्कर में रहता है। शहरों में आज हर जगह कारें ही कारें हैं। आज हर पार्क पार्किंग में बदल गया है। कारों के चक्कर में कोई पटरी पर चल नहीं पा रहा। कारों के कारण हर सड़क पर यातायात जाम रहता है।

हर सरकार चाहती है कि जनता सार्वजनिक वाहन का प्रयोग करे। हर सरकार ‘कार फ्री डे’ मनाना चाहती है। अगर ऐसा है तो सरकारी बैंकों को ‘कार लोन’ बंद कर देना चाहिए ताकि कार लेने की वही सोचे जिसकी जेब में कार के लिए पूरी रकम हो। सरकारी बैंक माल वाहनों के लिए सरलता से कर्ज नहीं देते। बैंक आॅफ बड़ौदा 9.9 फीसद ब्याज पर कर्ज दे रहा है लेकिन कोई बैंक माल वाहन पर कर्ज 10 फीसद से कम ब्याज पर कर्ज नहीं दे रहा। (जीवन मित्तल, मोती नगर, दिल्ली)

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कर चोरी के खिलाफ

हमारे देश में हर साल करोड़पतियों की तादाद कुछ बढ़ जाती है लेकिन उस अनुपात में आयकरदाताओं का संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो पाती। यह एक प्रवृत्ति-सी बन गई है कि लोग आय के ब्योरे यह सोच कर छिपाते रहते हैं कि जब कानून का शिकंजा कसेगा, तब देखा जाएगा। यों आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में सरकारी कर्मचारियों पर आयकर विभाग के छापे पड़ते रहते हैं, पर व्यवसाय आदि करने वालों को इसका भय कम ही सताता देखा जाता है। आयकर विभाग ने बैंक खातों, वित्तीय लेन-देन आदि के जरिए लोगों की आमदनी का अंदाजा लगाने के लिए पुख्ता तंत्र विकसित किया हुआ है। बड़े लेन-देन में पैन कार्ड आदि की अनिवार्यता के चलते भी सूचनाएं आसानी से एकत्र हो जाती हैं, फिर भी कर चोरी करने वालों के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाए जा पाते, तो इसमें आयकर विभाग की शिथिलता बड़ा कारण है।

आमतौर पर बड़े कारोबारी आयकर चुकाने के मामले में ईमानदारी नहीं बरतते। फिर सरकार खुद अनेक मौकों पर औद्योगिक घरानों को वित्तीय सहूलियत देने के मकसद से उन्हें भारी कर माफी देती है। यह बात छिपी नहीं है कि अगर सिर्फ औद्योगिक घरानों पर कड़ी नजर रखी जाए और आयकर कानूनों के तहत कार्रवाई हो तो राजस्व घाटा काफी हद तक पूरा किया जा सकता है। काले धन पर रोक लगाने के मकसद से अनेक उपाय किए गए, पर इस दिशा में अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई है। कर चोरी से जुड़ी सूचनाएं उजागर करने के लिए आम नागरिकों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ सरकार को आयकर विभाग के कर्मचारियों को भी कर्तव्यनिष्ठ बनाने के उपायों पर विचार करना चाहिए। (अनिल धीमान, नंदनगरी, दिल्ली)

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