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जनतंत्र का तकाजा

करीब सात साल पहले राजशाही समाप्त होने के बाद नेपाल में जनतंत्र स्थापित करने वाला नया संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, मगर अनेक अवरोधों के चलते...

Author नई दिल्ली | October 28, 2015 10:53 PM

करीब सात साल पहले राजशाही समाप्त होने के बाद नेपाल में जनतंत्र स्थापित करने वाला नया संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, मगर अनेक अवरोधों के चलते से इसे अंतिम रूप देने में देर होती रही। मधेसी और जनजातीय समुदाय के लोग लगातार नए संविधान में प्रतिनिधित्व के मसले को लेकर विरोध जाहिर कर रहे थे। संविधान सभा के उनहत्तर सदस्यों ने संविधान निर्माण प्रक्रिया का बहिष्कार किया था। दरअसल, पहले वहां के संविधान में प्रावधान था कि निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण आबादी, भौगोलिक स्थिति, विशेष लक्षणों के अनुसार होगा और मधेसियों के मामले में यह जनसंख्या के प्रतिशत के आधार पर होगा।

लेकिन नए संविधान में एक तरह से मधेसी लोगों को बाहरी के तौर पर माना गया है। इसमें कहा गया है कि प्रमुख संवैधानिक पदों पर वही लोग होंगे, जो नेपाल के मूल निवासी हैं। इसी तरह मधेसी लोगों के राजनीति में प्रतिनिधित्व को भी संकुचित कर दिया गया है। मधेसी दरअसल भारत से जाकर वहां बस गए लोग हैं, मगर हकीकत यह है कि बरसों से वहां रहते हुए उन्होंने वहां की नागरिकता हासिल की है। उनमें से बहुत सारे लोग वहीं पैदा हुए और वहीं के होकर रह गए हैं, इसलिए उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े करना या फिर उनके प्रतिनिधित्व को लेकर भेदभाव रखना जनतांत्रिक नहीं कहा जा सकता।

नेपाल के नए संविधान में मधेसी और जनजातीय लोगों के प्रतिनिधित्व को लेकर भेदभाव के विरोध में उभरे आंदोलन को रोकने का यही तरीका हो सकता है कि संविधान के एतराज वाले पक्षों पर फिर से विचार हो। भारत ने जिन सात अनुच्छेदों में संशोधन का सुझाव दिया था, उनमें मधेसी लोगों के हितों की अनदेखी की गई है। भारत चूंकि नेपाल का पड़ोसी देश ही नहीं, उसके हर राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में मददगार रहा है, इसलिए उसके इस हस्तक्षेप का खासा महत्त्व है। श्रीलंका में तमिलों के अधिकारों की अनदेखी की वजह से वहां किस कदर राजनीतिक अस्थिरता का माहौल रहता है, यह छिपी बात नहीं है।

अगर नेपाल के संविधान में भी मधेसी और जनजातीय समुदाय के लोगों के साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व और रोजगार के अवसरों, वहां रहने, शादी-विवाह आदि करने को लेकर भेदभावपूर्ण उपबंध बनाए रखा गया, तो उसके दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं। यह चिंता केवल भारत की नहीं, किसी भी लोकतांत्रिक देश की होनी चाहिए कि वहां के नागरिकों के अधिकारों में भेदभाव उजागर हो। इस तरह किसी देश में सही अर्थों में जनतंत्र की स्थापना संभव नहीं हो सकती। अगर नेपाल में अस्थिरता का माहौल बना रहेगा तो जिस लोकतंत्र की स्थापना का सपना वह देख रहा है, वह अधूरा ही रहेगा। (विनय रंजन, मुखर्जी नगर, दिल्ली)

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भ्रष्टाचार की जड़ें
हमारे देश के निन्यानवे फीसद से अधिक लोगों की मानसिकता है कि वे भ्रष्टाचारियों को तब तक गाली देते हैं जब तक उन्हें स्वयं भ्रष्टाचार करने का मौका नहीं मिल जाता। मौका मिलते ही वही भ्रष्टाचार इस जनता के लिए शिष्टाचार या ‘बी प्रेक्टिकल’ का स्वरूप हो जाता है और जो एक फीसद से भी कम जनता जो भ्रष्टाचार नहीं करती या सचमुच भ्रष्टाचार की विरोधी है, उसे खत्म करवाने में देश की निन्यानवे फीसद जनता लग जाती है।

यही कारण है कि चाहे कितना ही बड़ा सत्ता-परिवर्तन क्यों न हो जाए, स्थितियां और बदतर होती चली जाती हैं। देश में सब कुछ सही होना तब तक संभव नहीं जब तक उपर्युक्त आंकड़ा बिलकुल इसके उलट न हो, अर्थात एक फीसद लोग निन्यानवे फीसद में और निन्यायवे फीसद लोग एक फीसद में अपनी मानसिकता को दृढ़तापूर्वक स्थानांतरित न कर लें। (आमोद शास्त्री, दिल्ली)

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दाल से दूर

आज जहां चौतरफा महंगाई आम आदमी की जेब काट रही है वहीं आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी दालों की कीमतों से लोगों की कमर ही टूट गई है। दालों की बढ़ी हुई कीमतों के कारण लोग अपने शरीर को आधारभूत पोषण भी नहीं दे पा रहे हैं। इसकी सबसे ज्यादा मार समाज के गरीब और मजदूर वर्ग पर पड़ी है जो अपना गुजारा दाल-रोटी खाकर करता है। साठ-सत्तर रुपए किलो मिलने वाली अचानक से दो सौ रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई।

जमाखोरी, केंद्र सरकार के ढीले रवैए और अकुशल प्रबंधन के कारण दालों के दाम इतने ज्यादा बढ़ गए कि वे आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गर्इं। ‘अच्छे दिनों’ का सपना दिखा कर आई सरकार ने इस समस्या पर गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाया और जमाखोरों पर कोई त्वरित कार्रवाई नहीं की। दाल जैसी पोषण की आधारभूत वस्तु के बढ़ते दामों से जहां जमाखोरों के बढ़ते प्रभाव का संकेत मिलता है वहीं सरकार की नीतिगत विफलता भी उजागर होती है। (विजय मीरचंदानी, अजमेर)

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कर चोरों के विरुद्ध

सरकार आयकर चोरी पर नकेल कसने को लेकर गंभीर है। वित्तमंत्री अरुण जेटली कई बार कर चोरी के खिलाफ अभियान छेड़ने की बात दोहरा चुके हैं। आयकर विभाग ने इस वित्तवर्ष में एक करोड़ नए करदाताओं को जोड़ने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए क्षेत्रवार लक्ष्य तय किए गए हैं। उसी क्रम में उसने कर चोरी करने वालों के बारे में सूचना उपलब्ध कराने वालों को पुरस्कृत करने की घोषणा की है। अगर कोई व्यक्ति कर चोरी करने वाले के बारे में पुख्ता सबूत के साथ जानकारी देता है तो उसे कुल रकम का दस प्रतिशत हिस्सा इनाम के तौर पर दिया जाएगा। इसमें पुरस्कार की राशि अधिकतम पंद्रह लाख रुपए तक रखी गई है। ऐसी सूचनाएं उजागर करने वालों की पहचान गुप्त रखने का भी एलान किया गया है।

आयकर न देने वालों के खिलाफ सरकार की इस सख्ती की वजहें साफ हैं। इस तरह उसे राजस्व घाटे से उबरने में काफी मदद मिल सकती है। मगर इस अभियान में उसे कितनी कामयाबी मिल पाएगी, कहना मुश्किल है। कर चोरी पुरानी समस्या है और इस पर नकेल कसना सरकारों के लिए हमेशा कठिन बना रहा है। नौकरी-पेशा वेतनभोगी लोगों की कमाई पर नजर रखना आसान है, उसे जांचने के लिए साधन मौजूद हैं। मगर व्यवसाय और स्वतंत्र रूप से कोई पेशा करने वालों की आमदनी का पता उनकी घोषणा के आधार पर चल पाता है। (सुषमा पाराशर, गांधी कॉलोनी, फरीदाबाद)

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